जंगल जासूस 👉
हजूर 👉17 जजों का इनकार और एक बेबाक अफसर👉भारतीय न्यायपालिका का सबसे बड़ा सस्पेंस?
हजूर 👉न्यायपालिका के बंद कमरों में जब भी उत्तराखंड कैडर के निर्भीक भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की फाइल खुलती है, तो कटघरे में सरकार के साथ पूरी व्यवस्था खड़ी नजर आती है। यह महज एक अफसर की अदालती लड़ाई नहीं है, बल्कि देश के कानूनी इतिहास का वह अनसुलझा दौर बन चुका है, जिसने भारत की शीर्ष न्यायपालिका के सामने अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है। रसूखदारों के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले इस अफसर के तर्कों और कानूनी दस्तावेजों की गहराई का असर ही कुछ ऐसा है कि मुकदमे का फैसला सुनाना तो दूर, जज साहबान इस फाइल को सुनने से ही कदम पीछे खींच रहे हैं।
हजूर 👉केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की दिल्ली स्थित प्रधान पीठ में 21 सितंबर का दिन भी एक बड़ा मोड़ लेकर आया। न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा की पीठ के सामने उत्तराखंड सरकार के उस फरमान पर बहस जारी थी जो अफसरों की गोपनीय मूल्यांकन रिपोर्ट से जुड़ा है। लेकिन कुछ ही मिनटों की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति ने बिना कोई ठोस कारण बताए खुद को इस केस से अलग करने का फैसला सुना दिया। इसके साथ ही संजीव चतुर्वेदी के मुकदमों से पीछे हटने वाले न्यायाधीशों का आंकड़ा बढ़कर 17 हो गया👉एक ऐसा अभूतपूर्व रिकॉर्ड जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहले कभी दर्ज नहीं हुआ।
हजूर 👉 इस अभूतपूर्व घटनाक्रम की जड़ें बेहद गहरी हैं और इनका दायरा देश की सबसे बड़ी अदालत तक फैला हुआ है। सुनवाई से हटने का यह सिलसिला सुप्रीम कोर्ट से शुरू हुआ था, जब तत्कालीन न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अफसरों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद नैनीताल हाईकोर्ट के चार न्यायाधीशों👉न्यायमूर्ति आलोक वर्मा, न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी, न्यायमूर्ति मनोज तिवारी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने भी एम्स सीवीओ काल के घोटालों, कैबिनेट नियुक्ति समिति के रिकॉर्ड और कोर्ट की अवहेलना से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करने के बजाय बिना कोई कारण बताए किनारा कर लिया।
हजूर 👉 प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के भीतर तो स्थिति और भी गंभीर नजर आती है। कैट के तत्कालीन अध्यक्ष न्यायमूर्ति एल. नरसिम्हन रेड्डी से लेकर न्यायमूर्ति आर.एन. सिंह, मनीष गर्ग, छबिलेंद्र राउल, राजीव जोशी, हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद जैसे 9 जजों ने एक-एक करके खुद को इन मुकदमों से अलग किया। केंद्रीय मंत्रियों द्वारा रिपोर्ट डाउनग्रेड करने का मामला हो या लोकपाल प्रतिनियुक्ति का विवाद, फाइलों को आगे बढ़ाने के बजाय जजों ने हटना ही सही समझा। यह सिलसिला जिला अदालतों तक भी पहुंचा, जहाँ एसीजेएम नेहा कुशवाहा ने पारिवारिक संबंधों की दुहाई दी और शिमला अदालत के जज ने हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव के मानहानि केस से अपने हाथ खींच लिए।
हजूर 👉एक तरफ कानूनी नियमों और तथ्यों के सहारे व्यवस्था को चुनौती देता अकेला अफसर खड़ा है, तो दूसरी तरफ देश के 17 नामी-गिरामी न्यायाधीश जो एक-एक करके इन मामलों की सुनवाई से खुद को दूर कर चुके हैं। बिना किसी स्पष्ट कारण के आदेश पत्रों पर दर्ज होता ‘नॉट बिफोर मी’ का फैसला अब सिर्फ मुकदमों का टलना भर नहीं है, बल्कि यह देश के न्यायिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। न्याय प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच का यह अनूठा टकराव भारतीय कानून के पन्नों में एक ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक सुनाई देती रहेगी।



