हजूर 👉अल्मोड़ा से देहरादून तक गूंजा चीड़ के जंगलों का दर्द, 👉कछियौला के किशन सिंह के जीपीएस वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट से खुली लीसा माफिया के काले खेल की पोल!

 

 

 

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉अल्मोड़ा से देहरादून तक गूंजा चीड़ के जंगलों का दर्द, 👉कछियौला के किशन सिंह के जीपीएस वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट से खुली लीसा माफिया के काले खेल की पोल!

हजूर 👉 उत्तराखंड का पानी और यहां के हरे-भरे पेड़ ही इस देवभूमि के लोगों को सांस और जीने का असली सहारा देते हैं। अलग राज्य बनने के बाद हर पहाड़ी के दिल में यह उम्मीद जागी थी कि अब हमारे पहाड़ और यहां के जंगल महफूज रहेंगे, लोगों को शुद्ध हवा और पानी मिलेगा। लेकिन यह सपना तभी सच हो सकता है जब लीसा तस्कर इन पेड़ों को अपनी लूट का जरिया बनाना छोड़ दें। आज सबसे बड़ा सच यह है कि यह मामला सिर्फ चोरी-छिपे लीसा पार करने भर का नहीं है, बल्कि यह उससे भी ज्यादा खतरनाक है👉यह सीधा मामला लीसा निकालने के नाम पर पहाड़ों के बेजुबान पेड़ों पर क्रूरता से घाव लगाने और उनकी सांसें घोंटने का है।

हजूर 👉 सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पोस्ट्स और कछियौला निवासी किशन सिंह के साझा किए गए जीपीएस वीडियो ने अल्मोड़ा के जंगलों में चल रहे इस खेल को बेनकाब किया है। हालांकि इन तमाम दावों और वीडियो को अभी तक आधिकारिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन इन्होंने महकमे और शासन के गलियारों में खलबली जरूर मचा दी है। इन पोस्टों और शिकायतों में यह गंभीर सवाल उठाया गया है कि निजी नाप खेती की अनुमति की आड़ लेकर किस तरह से सरकारी बेनाप जमीन और आरक्षित वनों के सीने पर कुल्हाड़ियां और छेनियां चलाई जा रही हैं। कागजों पर तो यह दिखाया जाता है कि लीसा किसी छोटे से निजी खेत के गिने-चुने पेड़ों से निकाला जा रहा है, लेकिन असल खेल यह रचा जाता है कि अनुमति का दायरा चुपचाप फैलाकर आसपास के बेनाप सरकारी जंगलों के उन पेड़ों तक पहुंचा दिया जाता है, जिनकी रखवाली करने वाला कोई नहीं होता।

हजूर 👉 वायरल हो रहे इन वीडियो और चर्चाओं में सबसे ज्यादा दर्दनाक तस्वीर चीड़ के उन छोटे और मासूम पेड़ों की है, जिन पर लीसा निकालने के लिए चीरे लगाए गए हैं। दावों के मुताबिक महज एक फीट तक की गोलाई वाले नौनिहाल पेड़ों के तनों पर भी गहरे घाव करके गमले टांग दिए गए हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या वन विभाग के निर्धारित नियमों और तकनीकी मानकों के तहत इतने छोटे पेड़ों से लीसा टपकाने की अनुमति होती है? किशन सिंह द्वारा साझा की गई जीपीएस लोकेशन के आधार पर लोग यह मांग कर रहे हैं कि संबंधित विभाग की टीम खुद मौके पर जाकर पेड़ों की गोलाई की माप करे, गमलों की गिनती करे और अनुमति-पत्रों से स्थलीय स्थिति का मिलान करे, ताकि यह साफ हो सके कि नियमों का पालन हुआ है या नहीं।

हजूर 👉 मामले के साथ ही लीसे के कनस्तरों की जब्ती से जुड़े आंकड़े भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, रामनगर में 390 कनस्तर, बाजपुर में 348 और मोरनौला–शहरफाटक मार्ग पर 534 टिन पकड़े जाने की बातें सामने आई हैं, जिनका कुल योग 1,272 टिन बनता है। हालांकि, इन पकड़े गए कनस्तरों और अल्मोड़ा के वायरल वीडियो के बीच कोई सीधा संबंध है या नहीं, यह अभी स्थापित नहीं हुआ है। इसके लिए जब्त माल के स्रोत, ट्रांजिट परमिट और संबंधित रेंजों के निकासी रजिस्टरों की गहनता से पड़ताल होना जरूरी है। सड़क पर गाड़ियों से कनस्तर जब्त करना एक बात है, लेकिन वह माल जंगल के किस हिस्से से निकला👉उसकी पूरी कड़ी को आपस में जोड़ना जांच का मुख्य विषय है।

हजूर 👉 इन तमाम सवालों के बीच यह भी चर्चा है कि इस मामले को उठाने के बाद स्थानीय स्तर पर दबाव बनाने या डराने-धमकाने जैसी बातें सामने आई हैं, जिनकी अपनी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन इन सबसे परे, अब जनहित में सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि जांच का दायरा केवल बयानों तक सीमित न रहे। वीडियो में दिखाई गई जगहें, जीपीएस लोकेशन, जमीन का मालिकाना हक और पेड़ों की गोलाई👉इन सभी बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, और यदि आरोप सही नहीं पाए जाते तो जांच रिपोर्ट के जरिए स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जानी चाहिए। उत्तराखंड के लोगों ने अपने खून-पसीने से इस राज्य को इसलिए नहीं सींचा था कि यहां के जंगलों को चंद ठेकेदारों की चरागाह बना दिया जाए। पेड़ों की इन अनगिनत चीखों और उनकी शहादत का हिसाब अब इस हुकूमत को देना ही होगा!

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