जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 मिट्टी ने पकड़ा ‘लीसा एक्सप्रेस’ का पहिया, खुला कैंटर तो फटी रह गईं आंखें!
हजूर 👉अरे साहब, कमाल देखिए! जिस काम को करने के लिए अक्सर पूरी-पूरी टीमें, भारी-भरकम नाकाबंदी और हफ्तों की निगरानी भी छोटी पड़ जाती है, वह कारनामा मोरनौला की मिट्टी ने चुटकी में कर दिखाया। लीसा से लबालब लदा एक कैंटर बड़े गुपचुप अंदाज में मैदानी इलाकों की तरफ सरपट भागा जा रहा था। मगर शायद पहाड़ की मिट्टी को यह बेवफाई मंजूर नहीं थी👉उसने कैंटर का पहिया ऐसा पकड़ा कि ड्राइवर साहब ने एड़ी-चोटी का जोर लगा लिया, पर गाड़ी टस से मस न हुई। जब वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर कैंटर की ‘सीक्रेट बॉडी’ का घुंघट उठाया, तो अंदर का नजारा देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गईं। ठसाठस भरे पड़े थे पूरे 534 कनस्तर लीसा! अब जरा सोचिए, अगर उस दिन वह मिट्टी ‘ईमानदार’ न निकलती और जरा सी नरम पड़ जाती, तो यह माल न जाने किस गोदाम में उतरकर अफसरों की आंखों से हमेशा के लिए ओझल हो चुका होता। इस एक धंसाव ने सीधे-सीधे यह तीखा सवाल दाग दिया है कि आखिर पहाड़ का सीना छलनी करके इतना लीसा लाया कहां से जा रहा है?
हजूर 👉 वैसे मोरनौला की मिट्टी अकेली ‘मुखबिर’ नहीं बनी, बाजपुर से लेकर रामनगर तक लीसे की ऐसी ‘पैराशूट लैंडिंग’ हो रही है कि पूछिए मत। बाजपुर की सुल्तानपुर पट्टी चौकी पुलिस ने जब दांव मारा तो 348 कनस्तर हाथ लगे, और उधर रामनगर के टेढ़ा वन बैरियर पर संयुक्त टीम ने 390 टिन लीसा धर दबोचा। हद तो तब हो गई जब रामपुर के एक डिपो में 1200 टिन संदिग्ध लीसे की बाकायदा जांच शुरू होने की बात सामने आ गई। अलग-अलग मोर्चों पर सामने आ रही इन खेपों को देखकर तो जनता का यह पूछना बिल्कुल जायज है कि यह लीसा जंगलों से बह रहा है या पहाड़ों में कोई ‘कनस्तर बनाने की फैक्ट्री’ खुल गई है? जो गाड़ियां मिट्टी में फंस गईं या पकड़ में आ गईं, वे तो अखबार की चटपटी खबर बन गईं, लेकिन जो गाड़ियां बिना किसी रुकावट के सरपट निकल गईं, उनके माल का हिसाब किस सरकारी रजिस्टर में दर्ज होगा?
हजूर 👉 कागजों में भले ही यह पूरा खेल केवल जब्त किए गए डिब्बों का आंकड़ा दिखता हो, लेकिन असल में यह हमारे चीड़ के पेड़ों का रोना है। तस्कर भाई साहब लोग हाथ में औजार लेकर निकलते हैं, तने पर बेदर्दी से गहरा कट मारते हैं और लीसा टपककर कनस्तर में बंद हो जाता है। तस्करों के लिए तो उस लीसे की हर एक बूंद ‘कड़कड़ाता नोट’ है, लेकिन बेचारे पेड़ों के लिए यह सीधा-सीधा नासूर है। नियमविरुद्ध और अंधाधुंध दोहन के कारण चीड़ के पेड़ अंदर से कमजोर होकर सूखने लगते हैं और गर्मियों के मौसम में ऐसे ही जख्मी जंगल आग के लिए बारूद का काम करते हैं। यानी तस्करों का कनस्तर भरता रहे और पहाड़ का जंगल खाली होता रहे👉वाह रे कुदरत का गणित! मुनाफा किसी एक की जेब में जाए और पूरे पर्यावरण के विनाश का नुकसान पूरी जनता भुगते!
हजूर 👉 इस पूरी कहानी में असली तड़का लगाया शिकायतकर्ता किशन सिंह के दो वायरल वीडियो ने, जिसने महकमे में हड़कंप मचा दिया। करीब दो मिनट के इन वीडियो में लीसे के कथित अवैध दोहन, तस्करी के नए-नवेले रास्तों और कथित विभागीय मिलीभगत को लेकर ऐसे-ऐसे दावों की बौछार की गई है कि सुनने वाले भी हैरान रह जाएं। अब इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह तो आने वाली जांच ही तय करेगी, लेकिन मोरनौला के 534 कनस्तर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि मामला पूरी तरह हवा-हवाई तो नहीं है। जब सैकड़ों कनस्तरों से लदा वाहन जंगलों की सीमा लांघकर सीधे मुख्य सड़क पर फर्राटा भरने लगे, तो यह सोचना बनता है कि आखिर उस वक्त हमारी गश्ती व्यवस्था किस पेड़ के पीछे आराम फरमा रही थी?
हजूर 👉 अब अगर जांच का अंत सिर्फ कैंटर सीज करने, चालक को जेल भेजने और फाइल पर लाल फीता बांधने तक सीमित रह गया, तो समझिए कि इस खेल के असली ‘डायरेक्टर-प्रोड्यूसर’ अगली फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने में जुट जाएंगे। जांच को कैंटर से आगे बढ़कर उस पेड़ तक जाना होगा जहां पहला अवैध कट लगा था, और उस आखिरी खरीदार के आलीशान गोदाम तक पहुंचना होगा जिसने इसका ऑर्डर दिया था। जब तक यह पता नहीं चलेगा कि माल किस जंगल का था, दस्तावेज किसके नाम के थे और किसकी शह पर यह बेखौफ गाड़ियां दौड़ रही थीं👉तब तक यह खेल रुकने वाला नहीं है। आखिर में मोरनौला की उस मिट्टी को सलाम, जिसने एक कैंटर रोककर इतना बड़ा सवाल खड़ा कर दिया👉 वरना गाड़ियां आती-जाती रहेंगी, कनस्तर भरते रहेंगे और पहाड़ चुपचाप अपना दम तोड़ता रहेगा।



