हजूर 👉जंगल में नए साहब का जलवा! सुबह अफसरों की खबर ली, फिर बजट का हिसाब… दोपहर में ‘तीन-तीन’ की बैठक! वन्यजीव बोले 👉हजूर, हमारी बारी कब?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉जंगल में नए साहब का जलवा! सुबह अफसरों की खबर ली, फिर बजट का हिसाब… दोपहर में ‘तीन-तीन’ की बैठक! वन्यजीव बोले 👉हजूर, हमारी बारी कब?

हजूर 👉उत्तराखंड के वन महकमे में नए साहब की एंट्री हुई तो शुरुआत ही ऐसी कि पुराने प्रोटोकॉल की चाल पर चर्चा होने लगी। तबादले का आदेश जारी हुआ, चंद घंटे बाद चार्ज संभाला और अगले दिन सुबह से अधिकारियों की बारी-बारी जानकारी लेनी शुरू कर दी। कौन क्या संभाल रहा है, विभागीय कामकाज कहां तक पहुंचा 👉साहब ने पहले ही दिन जानकारी जुटाने में वक्त नहीं गंवाया। महकमे में हलचल है, लेकिन हजूर, जंगल के असली किरदारों का क्या? यहां अफसरों की कुर्सियां बदलती हैं, मगर जंगल में घूमते गुलदार, हाथी और बाघ किसी तबादला आदेश का इंतजार नहीं करते!

हजूर 👉 सुबह अधिकारियों का ब्योरा लिया गया तो उसके बाद बजट की फाइलें भी चर्चा में आ गईं। कितना पैसा आया, कितना खर्च हुआ और कितना बाकी है 👉साहब ने वित्तीय स्थिति की जानकारी ली। अब सवाल यह है कि बजट की रकम का हिसाब लेते वक्त वन्यजीवों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के इंतजामों का हिसाब भी उतनी ही गंभीरता से सामने आएगा या नहीं? क्योंकि सरकारी खाते में खर्च की एंट्री अपनी जगह है और गांव की पगडंडी पर गुलदार का खौफ अपनी जगह। कागज बता सकता है कि पैसा खर्च हुआ, मगर ग्रामीणों की सुरक्षा का नतीजा जमीन ही बताएगी।

हजूर 👉*दोपहर बाद रेंज अधिकारियों को तीन-तीन की टोलियों में बुलाकर बैठकें की गईं। जंगल के दफ्तर में यह तरीका चर्चा का विषय बना हुआ है। सुबह अफसरों की जानकारी, फिर बजट की पड़ताल और दोपहर में रेंजवार बातचीत 👉नए साहब के पहले दिन का कार्यक्रम कुछ ऐसा रहा। मगर हजूर, किसी रेंज की असली रिपोर्ट सिर्फ बैठक की मेज पर नहीं मिलती। जंगल में गश्त कैसी है, वन्यजीव आबादी तक क्यों पहुंच रहे हैं, संघर्ष प्रभावित इलाकों में निगरानी कितनी मजबूत है और शिकायतों पर कार्रवाई कितनी तेज है—इन सवालों के जवाब फाइलों के साथ मैदान से भी लेने होंगे।

हजूर 👉 नए साहब ने आते ही कामकाज और बजट की जानकारी जुटाकर अपनी कार्यशैली का संकेत दे दिया है। अब महकमे की असली परीक्षा इस बात में होगी कि बैठकों की तेजी जंगल की सुरक्षा और ग्रामीणों की राहत में कितनी बदलती है। वरना सरकारी दफ्तर में तीन-तीन अधिकारियों की टोली तो बैठ सकती है, लेकिन जंगल में घूमते वन्यजीवों को बैठक का एजेंडा कौन समझाएगा? 👉हजूर अफसरों की बारी आ गई, बजट की बारी भी आ गई 👉अब जंगल और इंसान, दोनों की सुरक्षा की बारी कब आएगी?

 

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