जंगल जासूस 👉
हजूर 👉आठ दिन का वन्यजीव उत्सव, 357 दिन का असली इम्तिहान! जंगल बचेगा या सिर्फ भाषणों में संरक्षण?
हजूर 👉 उत्तराखंड में एक से आठ अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह मनाया जाएगा। जंगल, वन्यजीव और प्रकृति संरक्षण के नाम पर जागरूकता अभियान चलेंगे, ग्रामीणों से संवाद होगा, स्कूली बच्चों को जोड़ा जाएगा और साहसी नागरिकों तथा वन कर्मियों को सम्मानित किया जाएगा। लेकिन वन्यजीव प्रेमी का सवाल सीधा है कि आठ दिन तक होने वाले इन आयोजनों के बाद उन गांवों का क्या होगा जहां शाम ढलते ही तेंदुए का डर शुरू हो जाता है, खेतों में हाथियों की दस्तक सुनाई देती है और जंगल की सीमा से लगे परिवार हर कदम फूंक फूंककर रखते हैं। वन्यजीव सप्ताह निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन असली परीक्षा आठ अक्टूबर के बाद शुरू होगी। क्योंकि जंगल की असली तस्वीर मंच पर लगे बैनरों से नहीं, बल्कि जंगल से सटे गांवों की चौखट पर दिखाई देती है।
हजूर 👉 इस बार देशभर में वन्यजीव सप्ताह की थीम Connecting Habitats, Thriving Wildlife यानी आवासों को जोड़ना और फलते फूलते वन्यजीव रखी गई है। थीम शानदार है, लेकिन अब सवाल जमीन का है। वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते अगर सड़क, निर्माण, बस्तियों और दूसरी मानवीय गतिविधियों के बीच फंसते जाएंगे तो जानवर जाएंगे कहां। हाथी अपने पुराने रास्ते पर निकलेगा तो खेत में पहुंच सकता है, तेंदुआ भोजन की तलाश में आबादी की तरफ आ सकता है और भालू जंगल से बाहर दिखाई दे सकता है। इसके बाद विभाग की टीमें दौड़ेंगी, रेस्क्यू होगा और घटना सुर्खियां बनेगी। वन्यजीव प्रेमी पूछता है कि व्यवस्था हमेशा घटना के बाद क्यों जागे, घटना से पहले खतरे को पहचानने वाला मजबूत तंत्र क्यों न बने।
हजूर 👉 वाइल्डलाइफ एपीसीसीएफ विवेक पांडे के अनुसार एक से आठ अक्टूबर तक विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए आम जनता को जोड़ा जाएगा और स्थानीय लोगों से सीधा संवाद किया जाएगा। यही संवाद इस पूरे अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। लेकिन संवाद का मतलब सिर्फ ग्रामीणों को जागरूक करना नहीं होना चाहिए। जिस किसान की फसल हाथियों ने बर्बाद की, जिस परिवार का पशु तेंदुआ उठा ले गया या जिस गांव में लगातार वन्यजीवों की आवाजाही हो रही है, उसकी बात भी उसी गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। ग्रामीणों को केवल सावधानी बरतने की सलाह नहीं, बल्कि संवेदनशील इलाकों में प्रभावी गश्त, त्वरित रेस्क्यू, खतरे की समय पर सूचना, जरूरत के मुताबिक सोलर फेंसिंग और मुआवजे की तेज व्यवस्था चाहिए। यदि वन्यजीव सप्ताह के दौरान इन समस्याओं का बाकायदा रिकॉर्ड तैयार कर उनकी आगे समीक्षा हो, तभी यह अभियान वास्तव में जमीन से जुड़ा माना जाएगा।
हजूर 👉 वन विभाग साहसी नागरिकों और बेहतर कार्य करने वाले वन कर्मियों को सम्मानित करने जा रहा है। सम्मान निश्चित रूप से जरूरी है, क्योंकि जंगल की ड्यूटी आराम की नौकरी नहीं है। दूरदराज के बीटों में गश्त करने वाले कर्मचारी मौसम, जंगल और वन्यजीवों के जोखिम के बीच काम करते हैं। लेकिन सम्मान के साथ संसाधन और जवाबदेही भी जरूरी है। संवेदनशील इलाकों में कितने कर्मचारी तैनात हैं, सूचना मिलने के बाद टीम कितनी देर में पहुंचती है, रेस्क्यू के लिए पर्याप्त उपकरण उपलब्ध हैं या नहीं और बार बार संघर्ष वाले क्षेत्रों के लिए स्थायी रणनीति क्या है, इन सवालों का जवाब भी व्यवस्था को देना होगा। वरना सम्मान समारोह की तस्वीर तो शानदार होगी, लेकिन जंगल की जमीन पर कहानी वही पुरानी रह जाएगी।
हजूर 👉 सबसे बड़ा सवाल आठ अक्टूबर के बाद का है। क्या बैनर उतर जाएंगे, कार्यक्रम समाप्त हो जाएंगे और फिर अगले वन्यजीव सप्ताह तक वही पुरानी समस्याएं चलती रहेंगी। आलोचकों का कहना है कि केवल रैलियों, भाषणों और औपचारिक कार्यक्रमों से मानव वन्यजीव संघर्ष कम नहीं होगा। विभाग के पास इस बार इस धारणा को गलत साबित करने का पूरा अवसर है। संवेदनशील गांवों की पहचान, संघर्ष वाले इलाकों का वैज्ञानिक आकलन, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था, मुआवजे की निगरानी और ग्रामीणों के साथ नियमित संवाद को पूरे साल जारी रखा जाए तो आठ दिन का अभियान 365 दिन की व्यवस्था में बदल सकता है। वरना सवाल उठना लाजिमी है कि जंगल के नाम पर आठ दिन जागरूकता और बाकी दिन वही पुरानी बेबसी क्यों।
हजूर 👉 आखिरकार लड़ाई इंसान बनाम वन्यजीव की नहीं, बल्कि बिगड़ते संतुलन को संभालने की है। वन्यजीवों को सुरक्षित आवास चाहिए और जंगल की सीमा पर रहने वाले इंसानों को सुरक्षित जीवन। दोनों की जरूरतों को साथ लेकर चलना ही स्थायी संरक्षण का रास्ता है। वन्यजीव सप्ताह का असली प्रमाणपत्र किसी समारोह, रैली या सम्मान मंच से नहीं मिलेगा। प्रमाणपत्र तब मिलेगा जब किसी गांव में खतरा बढ़ने से पहले उसकी पहचान होगी, प्रभावित परिवार को समय पर सहायता मिलेगी, वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारे सुरक्षित होंगे और वन कर्मियों को काम करने के लिए पर्याप्त संसाधन मिलेंगे। वन्यजीव प्रेमी की नजर अब इसी सवाल पर रहेगी कि एक से आठ अक्टूबर का यह अभियान सिर्फ आठ दिनों की चमक बनकर रह जाता है या सच में पूरे साल जंगल और गांव दोनों की सुरक्षा की नई कहानी लिखता है।



