जंगल जासूस 👉
हजूर 👉वन्यजीव प्राणी सप्ताह 👉 मंच पर सह-अस्तित्व के भाषण, लालढांग के खेत में हाथी का तांडव! किसान सतपाल की मौत ने पूछ लिया बड़ा सवाल 👉 हजूर, इंसान बचेगा कैसे?
हजूर 👉 उत्तराखंड में 2 से 8 अक्टूबर तक 70वां वन्यजीव प्राणी सप्ताह मनाया जा रहा है। मंच सजे हैं, माइक लगे हैं, कैमरों की फ्लैश चमक रही है और सह-अस्तित्व की मीठी बातें खूब हो रही हैं। वन्यजीवों को बचाने से लेकर जंगल और इंसान के रिश्ते तक के बड़े-बड़े संदेश दिए जा रहे हैं। मगर हजूर, इसी वन्यजीव सप्ताह के आखिरी दिन हरिद्वार के श्यामपुर-लालढांग इलाके से आई खबर ने इन चमकते मंचों की तस्वीर पर सवालिया निशान लगा दिया। सजनपुर पीली गांव के खेत में 60 वर्षीय किसान सतपाल की जिंदगी एक दंतैल हाथी के हमले में खत्म हो गई। मंच पर वन्यजीव सप्ताह का जश्न था और जंगल की सीमा पर एक परिवार में मातम।
हजूर 👉 सतपाल किसी जंगल सफारी पर नहीं निकले थे। वह नेशनल हाईवे के किनारे ठेके पर लिए अपने खेत में रखा धान और घास समेटने गए थे। शाम करीब पांच बजे जंगल की तरफ से एक दंतैल हाथी खेत में पहुंचा और किसान पर हमला कर दिया। ग्रामीणों के मुताबिक हाथी ने सतपाल को सूंड से पटक दिया। लोगों ने शोर मचाया तो हाथी जंगल की तरफ भाग गया, लेकिन तब तक सतपाल गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जिंदगी ने साथ छोड़ दिया। सुबह घर से निकला किसान शाम को वापस नहीं लौटा और पीछे छोड़ गया परिवार के लिए ऐसा खालीपन जिसे कोई मुआवजा भर नहीं सकता।
हजूर 👉 सतपाल की मौत के बाद ग्रामीणों का गुस्सा भी सड़क पर उतर आया। बाहर पीली अड्डे के पास हरिद्वार-नजीबाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर ग्रामीण एकत्र हुए और वन विभाग की व्यवस्था पर सवाल उठाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस दंतैल हाथी ने सतपाल पर हमला किया, वह पिछले कई दिनों से आबादी और खेतों के आसपास देखा जा रहा था। ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि घटना से कुछ दिन पहले इसी हाथी ने बाहर पीली अड्डे के पास सड़क पर चल रही एक थार गाड़ी को पलटने का प्रयास किया था। अगर यह दावा सही है तो सवाल और बड़ा हो जाता है कि खतरे के संकेत पहले से मौजूद थे, फिर खेत में काम करने वाले किसान तक चेतावनी क्यों नहीं पहुंची।
हजूर 👉 ग्रामीणों ने करीब दो साल पुराने एक मामले को याद करते हुए वन विभाग के कथित दोहरे रवैये पर भी सवाल उठाए। ग्रामीणों के अनुसार तब इसी इलाके में एक किसान के खेत में हाथी की मौत हुई थी और किसान के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करते हुए उसे जेल भेज दिया गया था। अब ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब खेत में हाथी मरता है तो किसान से जवाब मांगा जाता है, लेकिन जब खेत में किसान मरता है तो जवाबदेही का सवाल मुआवजे और गश्त बढ़ाने की घोषणा पर क्यों अटक जाता है। यह ग्रामीणों का आरोप है, लेकिन सवाल ऐसा है जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
हजूर 👉 घटना के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और हाथी को जंगल की ओर खदेड़ने की कार्रवाई की गई। हरिद्वार के डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध ने संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त और निगरानी बढ़ाने तथा मृतक के परिजनों को नियमानुसार राहत और मुआवजा देने की प्रक्रिया की बात कही है। कार्रवाई जरूरी है, मुआवजा भी जरूरी है, लेकिन ग्रामीणों का सवाल घटना के बाद की कार्रवाई से पहले की व्यवस्था को लेकर है। अगर हाथी लगातार आबादी के आसपास घूम रहा था तो उसकी ट्रैकिंग कहां थी, ग्रामीणों को अलर्ट करने की व्यवस्था क्या थी और खेतों में काम करने वाले लोगों को समय रहते खतरे की जानकारी क्यों नहीं मिली।
हजूर 👉 वन्यजीव प्राणी सप्ताह का विरोध कोई नहीं कर रहा और वन्यजीवों की सुरक्षा भी जरूरी है। हाथी बचना चाहिए, जंगल बचना चाहिए और इंसान भी बचना चाहिए। असली सह-अस्तित्व तो यही है कि हाथी जंगल में सुरक्षित रहे और किसान खेत में सुरक्षित रहे। वन्यजीव सप्ताह की असली सफलता मंच पर बजने वाली तालियों से नहीं, बल्कि उस दिन होगी जब जंगल की सीमा पर रहने वाला किसान सुबह खेत जाए और शाम को सकुशल अपने घर लौटे। वरना हजूर, मंच पर सह-अस्तित्व के भाषण चलते रहेंगे और लालढांग जैसे खेत पूछते रहेंगे 👉 साहब, भाषण तो बहुत हो गए, अब इंसान की जान बचाने की बारी कब आएगी?



