जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 राजभवन में गूंजी कुमाऊं के जंगलों की हुंकार! गवर्नर ने जांबाज अफसर महेंद्र रेकुनी का किया भव्य नागरिक अभिनंदन🌹
हजूर 👉देहरादून के लोक भवन में जब वन्यजीव सप्ताह के समापन का शाही मंच सजा, तो सत्ता के गलियारों से उठे वादों का शोर बहुत ऊंचा था। लेकिन उस पूरे जलसे में सबसे भारी हुंकार तब गूंजी जब देवभूमि के जंगलों की असली ताकत यानी कुमाऊं की जमीनी मेहनत का परचम फहराया। राज्यसभा सांसद नरेश बंसल, सचिव सी. रविशंकर, हॉफ कपिल लाल और प्रमुख वन संरक्षक नीना ग्रेवाल जैसे आला हुक्मरानों की मौजूदगी में तराई पूर्वी वन प्रभाग की किशनपुर रेंज के वन क्षेत्राधिकारी महेंद्र सिंह रेकुनी ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा दिया। वन और वन्यजीव संरक्षण की जानलेवा ड्यूटी में उनके अदम्य साहस, बेबाक तेवरों और असाधारण समर्पण का लोहा राजभवन ने भी माना और उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने खुद उन्हें सम्मानित कर पूरे कुमाऊं का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया। राजभवन के उस सभागार की छत भले ही देहरादून में थी, लेकिन हर ताली की गड़गड़ाहट और गर्व की गर्माहट सीधे हल्द्वानी से लेकर किशनपुर के सबसे घने जंगलों तक धड़क उठी। वातानुकूलित कमरों के आराम में कागजी नियम बनाना बहुत आसान है, पर खूंखार शिकारियों के इरादों को धूल चटाकर और हिंसक वन्यजीवों की दहाड़ के बीच जान हथेली पर रखकर जंगल को बचाना जिगर का काम है👉और कुमाऊं के इस शेर ने साबित कर दिया कि पसीने और खून से लिखी मेहनत के आगे बड़े से बड़ा मंच भी छोटा पड़ जाता है।
हजूर 👉 मंच से जब राज्यपाल का भाषण गूंजा, तो उन्होंने बड़े साफ शब्दों में कहा कि वन्यजीव संरक्षण महज कोई औपचारिक कागजी अभियान नहीं, बल्कि हमारी आने वाली नस्लों की सांसे बचाए रखने की महा-जंग है। उन्होंने ललकारते हुए कहा कि बाघ की दहाड़ कायम रखनी है तो सेहतमंद जंगल चाहिए, हाथियों के कुनबे के लिए बिना रुकावट वाले अभेद्य गलियारे चाहिए, पक्षियों के लिए आजाद आसमान चाहिए और हर बेजुबान के लिए उसकी कुदरती ज़मीन चाहिए👉क्योंकि जंगलों की जरूरतें किसी हुकूमत की कागजी लकीरों की मोहताज नहीं होतीं। इसी मंच पर हॉफ कपिल लाल ने ‘जुड़े हुए आवास, समृद्ध वन्यजीवन’ की हुंकार भरते हुए जंगल के गलियारों को बचाने की जमीनी हकीकत का खाका खींचा। राज्यपाल की ये गर्जना और नीतियां किसी चमत्कार से जमीन पर नहीं उतरतीं👉 इनके पीछे किशनपुर की कंकरीली पगडंडियों पर रात-दिन गश्त करने वाले महेंद्र रेकुनी और उनकी जांबाज टीम के पैरों के छाले, रात भर की कड़कड़ाती पहरेदारी और कभी न झुकने वाला हौसला होता है।
हजूर 👉 जैसे ही राजभवन से सम्मान का यह बिगुल बजा, तराई पूर्वी से लेकर पूरे कुमाऊं मंडल के वन महकमे की रगों में गर्व का खून दौड़ गया और विभागीय गलियारे जश्न के हुड़दंग से गूंज उठे। मुख्य वन संरक्षक डॉ. अरविन्द तेजस्विनी पाटिल, वन संरक्षक नितीश मणि त्रिपाठी, डीएफओ दीपक कुमार और एसडीओ अनिल जोशी से लेकर साथी रेंज अधिकारी चंदन अधिकारी, प्रदीप पंत, नवीन पवार, घनानंद चन्याल, हरेंद्र बिष्ट, कैलाश गुणवंत और राजेन्द्र सिंह मनराल समेत पूरा वन परिवार इस ऐतिहासिक जीत पर झूम उठा। यह कोई साधारण जश्न नहीं था👉आमतौर पर जंगल का सिपाही मीडिया की सुर्खियों में तब आता है जब कोई हादसा हो जाए, लेकिन इस बार इतिहास बदला था और सुर्खी किसी त्रासदी की नहीं बल्कि कुमाऊं की मिट्टी के पसीने की महा-जीत की थी। तमगा भले ही महेंद्र रेकुनी की वर्दी की छाती पर सजा हो, पर उसकी धमक ने कंधे पर बंदूक टांगकर रात के सन्नाटे में जंगल की ढाल बनने वाले हर उस छोटे-बड़े जांबाज सिपाही के सीने को 56 इंच का बना दिया जो बिना किसी लालच के फर्ज की वेदी पर डटा रहता है।
हजूर 👉 अब राजभवन का वह जगमगाता जलसा खत्म हो चुका है, मंच की दूधिया रोशनियां बुझ चुकी हैं और तस्वीरें भी सरकारी फाइलों के पन्नों में अपना मुकाम पा लेंगी। लेकिन किशनपुर के जंगलों में फर्ज की जंग कभी खत्म नहीं होती👉वहां आज भी वही खूंखार झाड़ियां हैं, वही जानलेवा खतरे हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष का वही खूनी समर सामने खड़ा है। यह सम्मान सिर्फ शॉल लपेटने या दीवार पर फ्रेम टांगने का कोई सरकारी ढकोसला नहीं है, बल्कि यह उन गुमनाम सूरमाओं की पीठ पर इतिहास की वह सबसे मजबूत थपकी है जो बिना किसी कैमरे की चकाचौंध के घने जंगलों को अपनी छाती से लगाए रखते हैं। राजभवन के शाही दरबार ने इस बार कुमाऊं की सोंधी मिट्टी के स्वाभिमान और जंगल के असली हीरो के काम का सम्मान किया है। अब तालियों की गूंज शांत हो चुकी है और असली संग्राम शुरू होगा👉जब इस सम्मान की लपटें किशनपुर की बीटों में एक नए जुनून, भयानक तेवर और जंगल को हर कीमत पर बचा लेने की एक खूंखार सनक बनकर गश्त करती दिखाई देंगी!



