जंगल जासूस 👉
हजूर 👉तबादला आदेश हुए बेअसर👉हुजूर, फरमान जारी मगर कर्मचारियों का पुरानी ‘मखमली’ कुर्सी से मोह नहीं छूटा!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विभाग में जब शासन और मुख्यालय स्तर से तबादला आदेश निकलता है, तो लगता है मानो लालफीताशाही की फाइलों में बड़ा जलजला आ गया है और कागजों पर कर्मचारियों की कुर्सियां हिल गई हैं। मगर धरातल की कड़वी हकीकत तो यह है कि कागजी हुक्म जारी होने के तीन-चार महीने बीत जाने के बावजूद करीब दो सौ कर्मचारियों का पुरानी जगहों से मोह छूटने का नाम ही नहीं ले रहा। जून में ट्रांसफर एक्ट के तहत बड़े पैमाने पर फॉरेस्ट गार्ड, फॉरेस्टर और डिप्टी रेंजरों के तबादले किए गए थे, लेकिन आज भी सैकड़ों वनकर्मी पुरानी ही मेज पर खूंटा गाड़कर जमे हुए हैं। आखिर कागजों में जारी फरमान और जमीन पर उस पर अमल होने के बीच की यह दूरी किसके रसूख का नतीजा है?
हजूर 👉 दफ्तरों के भीतर का हाल देखिए तो केस दर केस इस खेल की पोल खुलती नजर आती है। उत्तरकाशी डिवीजन में एक फॉरेस्ट गार्ड का तबादला हुआ, लेकिन “प्रतिस्थानी (रिप्लेसमेंट) नहीं आया” का बहाना बनाकर उन्हें रिलीव ही नहीं किया जा रहा। अल्मोड़ा डिवीजन में भी एक फॉरेस्टर साहब तबादला आदेश के बावजूद पुरानी जगह डटे हुए हैं। देहरादून डिवीजन का हाल तो और भी अनोखा है, जहां एक फॉरेस्ट गार्ड का दो-दो बार तबादला आदेश जारी हो चुका है, फिर भी साहब पुरानी रेंज में ही डटे हुए हैं। हद तो तब हो जाती है जब कॉर्बेट पार्क के करीब आठ कर्मियों को काफी पहले तबादला आदेश जारी होने के बाद भी आज तक रिलीव नहीं किया गया। जब महकमे के आला अधिकारी खुद अपने दस्तखत से आदेश जारी करते हैं, तो फिर मातहतों से उस पर अमल कराने में ऐसी लाचारी क्यों दिखानी पड़ती है?
हजूर 👉 अंदरखाने की चटपटी चर्चाओं पर कान लगाएं तो यह खेल सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक्सटेंशन और जुगाड़ की गहरी पटकथा रची गई है। कई कर्मचारियों को उनके अधिकारी रिलीव नहीं कर रहे, तो कइयों ने खुद ही ऊपरी स्तर से ‘एक्सटेंशन’ का इंतजाम कर लिया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है जो अपनी नई तैनाती पर जाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रिलीव नहीं किया जा रहा। कर्मचारी संघ ने तो यहां तक चेतावनी दे डाली है कि अगर रिलीव न करने वाले अधिकारियों और डीएफओ पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन होगा। सवाल सीधा है👉जब पीसीसीएफ ने 30 सितंबर तक सभी को नई पोस्टिंग पर भेजने के कड़े निर्देश दिए थे, तो फिर उनके आदेश की हवा किसने निकाली?
हजूर 👉 सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि सरकारी आदेश जारी होने के बाद आखिर जवाबदेही का चाबुक किसके हाथ में है? मुख्यालय स्तर से दावा किया जा रहा है कि उनके यहां से सभी को रिलीव कर दिया गया है और अब संरक्षक या अन्य स्तर पर पेंडिंग मामलों की डिटेल मांगी जा रही है ताकि लापरवाही करने वालों पर कार्रवाई हो सके। लेकिन फाइलों में तबादला आदेश मौजूद होने और जमीन पर पुरानी कुर्सी पर ही साहबों के डटे रहने का यह ‘फेविकोल वाला मोह’ साफ बयां कर रहा है कि विभाग की तबादला नीति पूरी तरह बेअसर साबित हो रही है। अब देखना यह होगा कि मुख्यालय का चाबुक सच में चलता है या यह तबादला एक्सप्रेस ऐसे ही फाइलों के चक्कर काटती रहेगी!



