जंगल जासूस 👉सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर 👉
हजूर 👉 चोरों की मौज या महकमे की मेहरबानी?👉 चौकीदार विहीन डिपो से खैर के 35 नग फुर्र!
हजूर 👉 ‘जंगल जासूस’ का यह वो विस्फोटक और कड़क अंक है, जिसे पढ़कर महकमे के बड़े-बड़े साहबों की ठंडी हवा हवाई क्यों न हो जाएगी? कालाढूंगी वन निगम के डिपो नंबर-2 में अभी दो दिन पहले जो सनसनीखेज कांड हुआ है, क्या उसने यह साबित नहीं कर दिया है कि यहाँ कानून, पहरेदारी और जिम्मेदारी सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं, बाकी जमीन पर तो चोरों की खुली मौज और अफसरों की गहरी नींद का अनूठा खेल चल रहा है?
हजूर 👉 जरा सोचिए! डिपो के भीतर खैर की बेशकीमती लकड़ी के पूरे 35 बड़े-बड़े नग महज दो दिन पहले अचानक ऐसे फुर्र कैसे हो गए, मानो वे कोई जादू के तिनके रहे हों? लेकिन इस पूरी चोरी की कहानी का सबसे बड़ा, सबसे खतरनाक और होश उड़ा देने वाला सच क्या यह नहीं है कि 👉 उस डिपो में कोई चौकीदार है ही नहीं? जी हाँ, क्या आप बिल्कुल सही सुन रहे हैं? जिस डिपो में करोड़ों रुपए की सरकारी लकड़ी खुले आसमान के नीचे सीना तानकर रखी जाती है, वहाँ महकमे ने रखवाली के लिए एक अदद चपरासी या चौकीदार तक तैनात करने की जहमत क्यों नहीं उठाई? जब रखवाला ही कोई नहीं है, तो फिर चोरों को चोरी करने की क्या जरूरत पड़ी होगी? क्या वह महकमे की तरफ से सीधा-सीधा खुला निमंत्रण नहीं है कि आइए, अपनी गाड़ी लाइए, माल लादिए और राजा बाबू की तरह मजे से चलते बनिए?
हजूर 👉 अब जरा उस रात के फिल्मी और रोंगटे खड़े करने वाले दृश्य की कल्पना कीजिए। खैर के 35 नग क्या कोई बीड़ी के बंडल, सिगरेट की डिब्बी या टॉफी हैं, जो चोर अपनी जेब में ठूंसकर चुपचाप रफूचक्कर हो गए हों? इतनी भारी-भरकम और वजनी लकड़ी को उठाने के लिए क्या मजबूत ट्रक नहीं चाहिए? डिपो के भीतर माल लोड करने के लिए क्या विशालकाय हाइड्रा या लोडिंग मशीन का पंजा नहीं चाहिए, और मुख्य गेट से बाहर निकलने के लिए क्या चौड़ा रास्ता नहीं चाहिए? जब डीएसएम साहब और महकमे के नुमाइंदों ने डिपो को पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ रखा था, तो क्या चोरों को किसी का पहरा चीरने या मजबूत ताला तोड़ने की कोई मशक्कत भी करनी पड़ी होगी? क्या चोर आए नहीं होंगे, इत्मीनान से अपनी मशीन लगाई नहीं होगी, खैर के 35 मखमली नगों को गाड़ी में लादा नहीं होगा, और जाते वक्त क्या डिपो के खाली गेट को बाय-बाय भी करके नहीं गए होंगे? जब पहरा देने वाला कोई कुत्ता तक वहाँ नहीं भौंकता, तो फिर इस चोरी का ठीकरा किसके सिर फोड़ें? क्या चोरों पर या उस सोए हुए और लापरवाह सिस्टम पर, जिसने करोड़ों की इस संपदा को आवारा पशुओं और चोरों के हवाले कर रखा है?
हजूर 👉 और मजे की बात देखिए, क्या वन निगम के इन डिपो में सरकारी लकड़ी का गायब होना कोई नया करिश्मा है? इससे ठीक पहले क्या इसी कालाढूंगी इलाके के डिपो नंबर-1 से सागौन के 20 बेशकीमती नगों के गायब होने पर बाकायदा थाने की चौखट तक मामला नहीं पहुंचा था और मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था? यानी एक तरफ सागौन का गोलमाल और दूसरी तरफ दो दिन पहले चौकीदार विहीन डिपो से खैर के 35 नगों का रातोंरात गायब होना 👉 क्या यह इस बात की चीख-चीखकर गवाही नहीं दे रहा है कि वन निगम के ये डिपो अब सरकारी संपत्ति के महफूज गोदाम नहीं रह गए हैं, बल्कि यह तो अव्यवस्था और ढुलमुल कार्यप्रणाली का ऐसा अड्डा बन चुका है, जहाँ जब जिसका जी चाहे अपनी झोली भरकर निकल ले?
हजूर 👉 दो दिन पुरानी इस घटना ने और “चौकीदार न होने” के इस विस्फोटक सच ने क्या अब रामनगर से लेकर हल्द्वानी तक के दफ्तरों में खलबली नहीं मचा दी है? क्या स्टॉक का रजिस्टर भी अपनी इस लाचारी पर खून के आंसू नहीं रो रहा होगा कि जब डिपो में कोई रखवाला ही नहीं था, तो फिर कागजों पर मिलान कौन सा अधिकारी करेगा? जब इस सनसनीखेज और शर्मनाक मामले पर ‘जंगल जासूस’ ने रामनगर क्षेत्र के जिम्मेदार आरएम (पश्चिमी क्षेत्र रामनगर) और डीएसएम साहब का पक्ष जानने के लिए फोन के चंगुल को घुमाया, तो क्या उधर से घंटियां लगातार घनघनाती नहीं रहीं 👉 टिन-टिन, टिन-टिन 👉 मगर क्या किसी भी बड़े साहब ने फोन उठाने की जहमत तक नहीं उठाई?
हजूर 👉 वन निगम के अधिकारियों की यह रहस्यमयी खामोशी और बिना चौकीदार के चल रहे इन डिपो का यह रामभरोसे राज, क्या यह साफ चीख-चीख कर नहीं कह रहा है कि यहाँ सिर्फ लकड़ी के 35 नग गायब नहीं हुए हैं, बल्कि पूरे के पूरे महकमे की ईमानदारी, नैतिकता और जिम्मेदारी ही हमेशा के लिए फुर्र हो चुकी है? अब देखना यह है कि डीएसएम साहब की नींद कब खुलती है और इस लाखो की संपदा के गायब होने का ठीकरा वे किसके सिर फोड़ते हैं, क्योंकि क्या ‘जंगल जासूस’ की पैनी नजर अब इस फाइल के हर एक पन्ने पर मुस्तैदी से नहीं गड़ी हुई है?



