जंगल जासूस 👉
हजूर 👉वन निगम में फर्जी श्रमिकों का महाघोटाला?👉’करोड़पतियों’ और अवैध मशीनों के नाम पर कागजी मजदूरी का खेल, 👉अब अदालत में खुलेगी पोल!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के शांत और हरे-भरे जंगलों से लेकर विभागीय दफ्तरों की बंद फाइलों तक इन दिनों एक ऐसा भयानक भूचाल आया हुआ है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की नींव हिलाकर रख दी है। रामनगर, आमडंडा, चांदनी डिपो और कालाढूंगी के जंगलों से उठी फर्जीवाड़े की यह चिंगारी अब एक ऐसे विशाल महाघोटाले का रूप ले चुकी है, जिसके खिलाफ अब अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा। सूचना के अधिकार यानी आरटीआई से निकले दस्तावेजों ने जब कागजों पर दर्ज नामों की परतों को उघाड़ना शुरू किया, तो ऐसे-ऐसे चौंकाने वाले और होश उड़ाने वाले तथ्य सामने आए कि जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
हजूर 👉 आरटीआई की फाइलों से हुआ सबसे बड़ा और सनसनीखेज खुलासा यह है कि जंगलों में लकड़ियों के कटान और डिपो में भारी-भरकम उठान के लिए जिन हाथों को मस्टर रोल में दर्ज किया गया है, उनमें से कई हाथ ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कुल्हाड़ी, आरी या लकड़ी के लट्ठों को छुआ तक नहीं है। कागजी रिकॉर्ड में शहर के वे नामचीन, रसूखदार और बेहद संपन्न लोग बतौर मजदूर पंजीकृत मिले हैं, जिनकी आर्थिक हैसियत करोड़ों में आंकी जाती है। हद तो तब हो गई जब स्थानीय राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाले और पूर्व में नगर पालिका के चेयरमैन प्रत्याशी रह चुके रसूखदार नेताओं के नाम भी जंगलों में कड़ाके की ठंड और तपती धूप में लकड़ी काटने वाले मजदूरों की सूची में दर्ज पाए गए।
हजूर 👉 फर्जीवाड़े का यह काला खेल यहीं खत्म नहीं हुआ, बल्कि आरटीआई के कड़वे कागजात इस बात की गवाही दे रहे हैं कि इस बहती गंगा में पूरे के पूरे परिवारों और कुनबों को समेट लिया गया। मस्टर रोल में सत्तर-अस्सी साल के उन वयोवृद्ध बुजुर्गों की दिहाड़ी भी दर्ज दिखाई गई है, जो उम्र के इस अंतिम पड़ाव में खुद चलने-फिरने के लिए दूसरों की लाठी के मोहताज हैं। बुजुर्गों से लेकर उनकी पत्नियों और घर के अन्य परिजनों के नाम पर हर महीने मजदूरी के मोटे-मोटे बिल फाड़े जाते रहे, जबकि हकीकत में वे अपने घरों की चारदीवारी से बाहर तक नहीं निकले थे।
हजूर 👉 इस कथित महाघोटाले का सबसे दर्दनाक, अमानवीय और हैरान करने वाला पहलू नाबालिग बच्चों के नाम पर चल रही कागजी मजदूरी का सामने आना है। सारे नियम-कानूनों और नैतिक ताक-झांक को दरकिनार करके अभिलेखों में मासूम बच्चों के नाम दर्ज कर दिए गए और उनके नाम से सरकारी खजाने से दिहाड़ी की रकम पूरी सफाई से हजम की जाती रही। कानूनन जिन बच्चों के हाथों में स्कूल का बस्ता और कलम होनी चाहिए थी, उन्हें वन निगम के फाइली पन्नों पर जंगलों के बीहड़ इलाकों में खतरनाक लकड़ी कटान जैसे जोखिम भरे कामों में जुटा हुआ दिखा दिया गया, जो सीधे-सीधे कानून और इंसानियत दोनों की धज्जियां उड़ाने जैसा है।
हजूर 👉 मामले के सबसे सनसनीखेज तकनीकी पहलू को देखें तो डीएसएम रामनगर द्वारा आरटीआई के तहत दी गई आधिकारिक जानकारी इस बात को साबित करने के लिए पूरी तरह काफी है कि जंगलों और डिपो में मशीनें पूरी तरह से अवैध रूप से संचालित हो रही हैं। आरटीआई से मिले यह आंकड़े और दस्तावेज चीख-चीख कर यह बयां कर रहे हैं कि बिना किसी तय नियम, अनुमति या टेंडर के धड़ल्ले से चलाई जा रही इन अवैध मशीनों का भारी-भरकम भुगतान चुकाने के लिए फर्जी मजदूरों का खतरनाक खेल रचा गया। इन अवैध मशीनों से कराए गए कामों के तमाम बिलों को फर्जी और कागजी मजदूरों के नाम रजिस्टरों में दर्ज करके ठिकाने लगाया गया है, ताकि किसी को कानोकान भनक तक न लगे।
हजूर 👉 सबसे हैरान करने वाली और गहरी सच्चाई यह है कि यह पूरा खेल और तिकड़म चलाने वाले वे तमाम पात्र👉चाहे वह डीएलएम हों जिन्होंने नाबालिग बच्चों के नाम पर फर्जी मजदूरी और कटान का भुगतान स्वीकृत किया, या फिर वह स्केलर जिसने अपने पूरे परिवार को ही कागजों में फर्जी श्रमिक बनाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया👉ये सभी के सभी लालकुआं क्षेत्र से ही ताल्लुक रखते हैं। लालकुआं की जमीन पर बैठकर रचे गए इस अंतर-विभागीय और पारिवारिक षड्यंत्र ने यह साबित कर दिया है कि किस तरह चंद लोगों ने मिलकर अपने चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी व्यवस्था का चीरहरण किया है।
हजूर 👉 अब चूंकि शिकायतों के लंबे दौर और आरटीआई के पुख्ता सबूतों के बाद इस मामले को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा, इसलिए ठंडे बस्ते में डालने और लीपापोती करने की तमाम विभागीय कोशिशों पर ब्रेक लगना तय माना जा रहा है। आने वाले दिनों में जब मस्टर रोल का मिलान बैंक खातों, डीबीटी भुगतानों और धरातल की वास्तविक स्थिति से होगा, तब यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि गरीब मजदूरों के हक का पैसा आखिरकार किसकी तिजोरियों में जाकर जमा हो रहा था। रामनगर से लेकर लालकुआं तक हर कोई अब इसी बात का सीधा जवाब मांग रहा है कि क्या मजदूरी सिर्फ कागजी रजिस्टरों में फर्जी नाम दर्ज कर लेने भर से पूरी हो जाती है, या फिर सरकारी खजाने से पैसा निकलने के लिए उस मजदूर का धरातल पर सचमुच पसीना बहाना भी जरूरी होता है।



