जंगल जासूस 👉
हजूर👉 क्यों पर्यावरण मंत्री से मिला ‘इको वारियर अवॉर्ड’👉 IFS धर्म सिंह मीणा के जुनून ने रचा नया इतिहास?
हजूर👉पहाड़ की प्यास बुझाने वाले हेवल मॉडल की मुकम्मल दास्तान👉 सिर्फ जलधारा नहीं, पूरे कुदरती तंत्र को जीवित करने की अनोखी पहल
हजूर👉 हेवल नदी का पुनरुजीवन महज एक बहती हुई जलधारा को दोबारा उफान पर लाने का किस्सा भर नहीं है, बल्कि यह उस क्रांतिकारी सोच की दास्तान है जिसने पहाड़ों के सूखते कलेजे पर हरियाली और उम्मीद की नई इबारत लिखी है। अमूमन जब किसी नदी को बचाने की बात होती है, तो लोग अक्सर उसके तटों पर आकर फावड़े चलाने लगते हैं या सिर्फ घाटों की सफाई तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन हेवल के मामले में कहानी एकदम जुदा है। यहां नदी को सिर्फ एक बहती हुई धारा मानने के बजाय उसके पीछे खड़ी समूची प्राकृतिक व्यवस्था, यानी उसके उद्गम स्थल, जंगलों, पहाड़ियों, रिचार्ज जोन, छोटे-छोटे झरनों और गांव के लोगों को एक ही डोर में पिरोया गया। उत्तराखंड कैडर के दो हजार नौ बैच के भारतीय वन सेवा अधिकारी धर्म सिंह मीणा की इसी दूरदर्शी सोच और बेजोड़ मेहनत ने रंग दिखाया, जिसके लिए उन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा प्रतिष्ठित इको वारियर अवॉर्ड से नवाजा गया। यह सम्मान सिर्फ एक अफसर की पीठ थपथपाना नहीं है, बल्कि उस सोच की जीत है जिसने प्रकृति को टुकड़ों में देखने के बजाय एक संपूर्ण जीवन चक्र के रूप में समझा।
हजूर👉पहाड़ों की तासीर को अगर गहराई से समझें तो यहां का गणित बड़ा सीधा पर पेचीदा है। मानसून में जब बदरा झमझमाकर बरसते हैं, तो ढलानों पर पानी रोक पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। अगर यह बारिश का पानी सीधे बहकर नदी में समा जाए तो कुछ दिन के लिए नदी में उफान जरूर दिखता है, लेकिन जैसे ही बादल छटते हैं, नदी फिर से अपने पुराने और सूखे दिन याद करने लगती है। इस पुरानी और दर्दभरी कहानी को बदलने के लिए हेवल मॉडल ने एक ऐसा पक्का इंतजाम किया जिसने पानी की बूंद-बूंद को पहाड़ की कोख में समाने पर मजबूर कर दिया। आंकड़ों की बाजीगरी पर गौर करें तो मामला बेहद दिलचस्प नजर आता है। इस पूरी मुहिम के दौरान एक सौ छब्बीस स्प्रिंग्स, अट्ठाईस छोटी स्ट्रीम्स और सोला रिचार्ज जोन्स को चिन्हित करके उन पर बारीकी से काम किया गया। यही नहीं, जल संरक्षण और जल-संग्रहण के लिए करीब एक लाख अट्ठावन हजार पांच सौ बहत्तर छोटी-बड़ी संरचनाएं बनाई गईं। इसके साथ ही बीस लाख बासठ हजार ऐसे पौधे रोपे गए जो न सिर्फ स्थानीय आबोहवा के अनुकूल थे बल्कि जमीन में नमी बनाए रखने और पानी को रोककर रखने में उस्ताद माने जाते हैं। जब जंगल पानी की कुदरती तिजोरी बन गए, तो सूखे के मौसम में भी नदी की धार को नीचे से सहारा मिलने लगा।
हजूर👉 इस पूरी कवायद का सबसे मजेदार और वैज्ञानिक पहलू यह रहा कि इसे केवल फावड़े-कुदाल या पारंपरिक अंदाजा-पैटर्न के भरोसे नहीं छोड़ा गया। इस काम में राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान और आईआईटी रुड़की जैसे नामचीन संस्थानों के वैज्ञानिक दिमाग को शामिल किया गया। जल प्रवाह की पल-पल की निगरानी, हाइड्रोग्राफ तैयार करना और हाइड्रोजियोलॉजिकल आकलन जैसी तकनीक का इस्तेमाल करके यह तय किया गया कि पानी असल में कहां से छनकर आ रहा है और उसे रोकने का सबसे सटीक बिंदु कौन सा होगा। लेकिन विज्ञान की यह प्रयोगशाला सिर्फ बंद कमरों या फाइलों तक सीमित नहीं रही। असली रंग तब जमा जब इसमें स्थानीय गांववालों, महिलाओं, वन पंचायतों और क्षेत्र की सामाजिक संस्थाओं को सीधे भागीदार बनाया गया। पानी बचाने के इस खेल को सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा न बनाकर गांव की खेती, आजीविका, जैव विविधता, ईको टूरिज्म और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व जैसे रोजमर्रा के ताने-बाने से जोड़ दिया गया। सीधा सा सवाल था कि अगर नदी में पानी बढ़ेगा तो गांव के चूल्हे पर क्या फर्क पड़ेगा, जंगल के जानवरों को क्या सुकून मिलेगा और लोग इस व्यवस्था को कितने लंबे समय तक अपने कंधों पर संभाल सकेंगे।
हजूर 👉धर्म सिंह मीणा को मिला यह इको वारियर सम्मान आज भले ही सुर्खियों में छाया हुआ हो और उत्तराखंड के लिए गर्व का सबब बना हो, लेकिन यह अपने पीछे एक बहुत बड़ा और तीखा सवाल छोड़ गया है। सवाल यह है कि अगर एक हेवल नदी को उसके उद्गम से लेकर गांव और जंगल तक पूरी व्यवस्था को साथ साधकर दोबारा जिंदा किया जा सकता है, तो फिर उत्तराखंड की सैकड़ों अन्य सूखती धाराओं और प्यासे पहाड़ों के लिए ऐसी समन्वित कोशिशें व्यापक पैमाने पर क्यों नहीं की जा सकतीं। इसमें कोई शक नहीं कि पुरस्कार मिलना एक शानदार उपलब्धि है और इस मेहनत का लोहा हर किसी ने माना है, मगर असली इम्तिहान तो अब शुरू होता है। आने वाले बरसों में यह देखना सबसे अहम होगा कि रोपे गए बीस लाख से ज्यादा पौधों में से कितने पेड़ बनकर खड़े हो पाते हैं, बनाई गई जल संरचनाएं वक्त की मार के आगे कितनी टिकाऊ साबित होती हैं, और सरकारी पहल के बाद स्थानीय समाज इस मॉडल की मशाल को कितनी शिद्दत से थामे रहता है। फिलहाल तो हेवल की बहती हुई छन-छन यही पैगाम देती है कि किसी नदी को बचाना है तो सिर्फ उसकी धारा को मत निहारिए, उसकी पूरी जिंदगी, उसकी रग-रग और उससे जुड़ी हर सांस को समझना होगा।



