जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 इंस्टाग्राम पर सजता था मूक जीवों के अंगों का काला बाजार, जसपुर से हरिद्वार तक फैले तस्करी के जाल ने खोल दी सिस्टम की पोल!
हजूर 👉 उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिले के जसपुर से शुरू हुआ वन्यजीवों की तस्करी का यह खेल अब देवभूमि के दूसरे छोर यानी हरिद्वार तक जा पहुंचा है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आस्था और अंधविश्वास की आड़ में किस तरह जंगलों को उजाड़ने का काला धंधा बेखौफ चल रहा है। जसपुर कोतवाली पुलिस और काशीपुर एसओजी की संयुक्त टीम ने जब ऑपरेशन प्रहार के तहत जाल बिछाकर एक शातिर को दबोचा, तो उसके पास से जो जखीरा बरामद हुआ, उसने खाकी से लेकर वन विभाग तक के पसीने छुड़ा दिए। मौके से एक सौ चौदह जोड़े हत्था जोड़ी, जंगली सूअर का एक दांत और पांच मोती शंख का मिलना यह चीख-चीखकर कह रहा था कि यह कोई छुटभैया अपराध नहीं, बल्कि किसी बड़े और गहरे सिंडिकेट का हिस्सा है। हत्था जोड़ी यानी बंगाल मॉनिटर लिजार्ड का सुखाया हुआ जननांग, जिसकी इतनी बड़ी खेप एक साथ बरामद होना इस बात का खौफनाक सबूत है कि बेज़ुबान जीवों का शिकार किस बेदर्दी से किया जा रहा है।
हजूर 👉 कहानी में असली भूचाल तब आया जब पुलिस और एसओजी ने पकड़े गए आरोपी आकाश दीक्षित से कड़ाई से पूछताछ की। पूछताछ में उसने जो उगला, उसने जांच की दिशा ही बदलकर रख दी। आरोपी ने खुलासा किया कि वह इन प्रतिबंधित अंगों का खुद शिकार नहीं करता, बल्कि इसके तार सीधे हरिद्वार से जुड़े हैं। उसने कबूल किया कि वह हरिद्वार के अमन नाम के एक युवक से हत्था जोड़ी का एक जोड़ा महज चार से पांच सौ रुपये में खरीदता था और फिर उसी माल को तंत्र-मंत्र, धन प्राप्ति और पूजा-पाठ का झांसा देकर भोले-भाले ग्राहकों को चार से पांच हजार रुपये तक में थमाता था। खरीद और बिक्री के बीच का यह मुनाफा साफ बताता है कि इस धंधेबाजों के लालच की कोई सीमा नहीं है। एक तरफ जहां अंधविश्वास के नाम पर लोगों की जेबें काटी जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जंगलों के भीतर प्रकृति का संतुलन पूरी तरह तहस-नहस किया जा रहा है।
हजूर 👉 इस काले कारोबार का एक और आधुनिक और हैरान करने वाला पहलू डिजिटल दुनिया से भी जुड़ा हुआ है। आरोपी केवल आमने-सामने ही यह सौदा नहीं कर रहा था, बल्कि सोशल मीडिया के बड़े प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम का खुलकर इस्तेमाल कर रहा था। दिव्य पूजा सामग्री के नाम से चलाई जा रही उसकी इंस्टाग्राम आईडी इस बात की गवाही देती है कि अब तस्कर तकनीक का सहारा लेकर अपने इस अवैध नेटवर्क को दूर-दराज के इलाकों तक फैला रहे हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए ग्राहकों तक पहुंच बनाना और घर बैठे प्रतिबंधित वन्यजीव अंगों की डिलीवरी करना यह बताता है कि अपराधी कानून की नजरों से बचने के लिए नए-नए पैंतरे अपना रहे हैं। जब इस तरह के सोशल मीडिया अकाउंट्स लंबे समय तक खुलेआम एक्टिव रहते हैं और साइबर निगरानी एजेंसियों को भनक तक नहीं लगती, तो सुरक्षा व्यवस्था की सुस्ती पर गंभीर सवाल खड़े होना लाजिमी है।
हजूर 👉 हरिद्वार के अमन का नाम सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर यह शख्स कौन है और इसके पीछे कौन सा बड़ा मास्टरमाइंड छिपा बैठा है। क्या अमन खुद जंगलों में जाकर शिकारियों से माल इकट्ठा करता है या वह किसी बड़े वन्यजीव तस्कर गिरोह का महज एक मोहरा भर है। हालांकि, पुलिस के अभी तक के बयानों या प्रेस नोट में अमन की गिरफ्तारी की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस एक नाम ने जांच के दायरे को जसपुर से खींचकर हरिद्वार की गलियों तक पहुंचा दिया है। इसके साथ ही एक बड़ा तकनीकी और वैधानिक सवाल यह भी है कि तस्करों ने भले ही जंगलों को छलनी करने में कोई कसर न छोड़ी हो, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बरामद हुए ये तमाम अंग उत्तराखंड के ही जंगलों के हैं या इन्हें किसी अन्य राज्य से तस्करी करके यहां लाया गया था। इस राज से पर्दा तभी उठेगा जब जांच एजेंसियां गहराई से इसकी तह तक पहुंचेंगी।
हजूर 👉 इन तमाम खुलासों के बीच सबसे तीखा और चुभता हुआ सवाल उत्तराखंड के वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता है। उच्च स्तर पर दीपावली और त्योहारों के इस संवेदनशील सीजन में जंगलों की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े फरमान जारी किए जाते हैं, गश्त बढ़ाने के कागजी निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन जब जसपुर जैसी सनसनीखेज घटनाएं सामने आती हैं, तो महकमे के मैदानी अमले की सक्रियता और जमीनी निगरानी के दावों की धज्जियां उड़ जाती हैं। यदि हरिद्वार का अमन या अन्य तस्कर इस तरह थोक के भाव में प्रतिबंधित वन्यजीवों के अंगों की सप्लाई कर रहे थे, तो क्या स्थानीय बीट अधिकारियों, रेंजरों और गश्ती दलों को इसकी भनक तक नहीं थी? क्या खुफिया तंत्र की गहरी नींद और खामोश संलिप्तता के बिना इतना बड़ा नेटवर्क चल पाना संभव था? जब पुलिस और एसओजी जाल बिछाकर तस्करों को दबोचती है, तब जाकर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।
हजूर 👉 यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक आरोपी की गिरफ्तारी या कुछ डिब्बों में बंद हत्था जोड़ी की जब्ती भर नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का कड़वा आईना है जो हमारे जंगलों और वन्यजीवों को अंदर से खोखला कर रहा है। जसपुर से उठी इस चिंगारी ने हरिद्वार के सप्लायर कनेक्शन और सोशल मीडिया के काले बाजारों की परतों को पूरी तरह उधेड़ कर रख दिया है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि पुलिस और जांच एजेंसियां इस मामले को सिर्फ एक छोटे मोहरे तक समेटकर रखती हैं या फिर हरिद्वार के उस असली खिलाड़ी तक पहुंचती हैं जो इस धंधे की जड़ है। जब तक इस पूरे सिंडिकेट और महकमे की सुस्ती के हर एक चेहरे को बेनकाब नहीं किया जाता, तब तक देवभूमि के जंगलों की सुरक्षा पर ऐसे ही तीखे सवाल उठते रहेंगे और ‘जंगल जासूस’ के खुलासों का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा!



