हजूर 👉30 सितंबर की म्याद खत्म👉अब खुलेगा तबादलों का पूरा हिसाब; हुकूम की तामील हुई या पुरानी कुर्सी फिर भारी पड़ी?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉30 सितंबर की म्याद खत्म👉अब खुलेगा तबादलों का पूरा हिसाब; हुकूम की तामील हुई या पुरानी कुर्सी फिर भारी पड़ी?

हजूर 👉 30 सितंबर की तारीख भी गुजर गई और अब उत्तराखंड वन विभाग में तबादलों की असली परीक्षा शुरू हो गई है। मुख्यालय ने आदेश जारी किए, नई तैनातियां तय कीं और अनुपालन के लिए समयसीमा भी मुकर्रर कर दी, लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि कागज पर दौड़ता तबादला जमीन पर कितना पहुंचा। सीसीएफ एचआरडी पीके पात्रो ने खुद कहा था कि तबादला सूची में शामिल कुछ कार्मिक अभी तक नई पोस्टिंग पर कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए हैं। इसी कारण विभिन्न डिवीजनों को पत्र भेजकर आदेशों का अनुपालन कराने को कहा गया और यह भी स्पष्ट किया गया कि आदेश लागू नहीं कराने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। अब म्याद खत्म हो चुकी है तो वन विभाग के गलियारों में सबसे ज्यादा उत्सुकता इस बात की है कि आखिर कितनी पुरानी कुर्सियां खाली हुईं और कितनी जगहों पर तबादला आदेश आने के बाद भी तस्वीर जस की तस बनी रही।

हजूर 👉 वन विभाग के जानकारों की मानें तो असली कहानी तबादला सूची में नहीं, बल्कि उसकी रिलीविंग और ज्वाइनिंग में छिपी है। आदेश निकलना तो पहला अध्याय था, असली किताब तब खुलेगी जब रिकॉर्ड सामने आएगा कि किस कर्मचारी को कब कार्यमुक्त किया गया और उसने नई जगह कब कार्यभार संभाला। कहीं कर्मचारी पुरानी तैनाती से रिलीव नहीं हुआ तो सवाल संबंधित कार्यालय से होगा और कहीं रिलीव होने के बाद नई जगह ज्वाइनिंग नहीं हुई तो जवाब संबंधित कार्मिक से मांगा जा सकता है। यही फर्क अब पूरे मामले की दिशा तय करेगा। क्योंकि अगर मुख्यालय का आदेश जारी हो चुका है तो पुरानी कुर्सी पर बने रहने का आधार भी रिकॉर्ड में होना चाहिए। अब 30 सितंबर के बाद हर उस मामले पर नजर रहेगी जहां आदेश और जमीन की तस्वीर एक-दूसरे से मेल नहीं खाती।

हजूर 👉 वन विभाग के जानकार यह भी मानते हैं कि मामला सिर्फ कर्मचारियों के आने-जाने का नहीं है, बल्कि विभागीय अनुशासन का सवाल है। मुख्यालय ने जब समयसीमा तय कर दी और संबंधित अधिकारियों को अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा तो अब यह देखना दिलचस्प होगा कि डेडलाइन के बाद विभाग किस स्तर पर कार्रवाई करता है। यदि कोई कर्मचारी नई जगह नहीं पहुंचा तो उसकी वजह क्या थी, किस अधिकारी ने उसे रिलीव किया या नहीं किया और क्या कोई लिखित अनुमति अथवा प्रशासनिक कारण मौजूद था। दूसरी तरफ जिस नई तैनाती पर कर्मचारी को जाना था, वहां उसकी जगह कौन जिम्मेदारी संभाल रहा है। जंगलों में फील्ड स्टाफ की भूमिका सीधे निगरानी और सुरक्षा से जुड़ी होती है, इसलिए एक जगह पद खाली और दूसरी जगह कर्मचारी का बने रहना केवल प्रशासनिक कागजी मामला नहीं माना जा सकता।

हजूर 👉 अब नजर उस रिपोर्ट पर है जो इस पूरी कहानी की परतें खोल सकती है। वन विभाग के जानकारों के अनुसार अगर मुख्यालय डिवीजनवार अनुपालन रिपोर्ट तैयार कराता है तो उसमें तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है कि कितने तबादले वास्तव में लागू हुए, कितने कर्मचारी नई तैनाती पर पहुंचे और कितने मामले अभी लंबित हैं। इससे यह भी सामने आ सकता है कि देरी कर्मचारी की वजह से हुई या आदेश लागू कराने वाले स्तर पर। और अगर कहीं आदेश लागू नहीं हुआ तो पहले से दी गई चेतावनी के मुताबिक जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। यही वह बिंदु है जहां 30 सितंबर की तारीख महज कैलेंडर की तारीख नहीं रह जाती, बल्कि मुख्यालय के आदेश की अग्निपरीक्षा बन जाती है।

हजूर 👉 अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 30 सितंबर की म्याद ने पुरानी कुर्सियों का मोह तोड़ा या नहीं। अगर सभी आदेशों की तामील हो गई है तो विभाग के पास इसे रिकॉर्ड के साथ स्पष्ट करने का मौका है। और अगर कुछ कर्मचारी अब भी पुरानी तैनाती पर हैं तो सवाल उनसे भी होगा और उन्हें वहां बनाए रखने वाले अधिकारियों से भी। क्योंकि मुख्यालय पहले ही कह चुका है कि आदेशों का पालन नहीं कराने पर कार्रवाई की जाएगी। अब कहानी बयान से आगे बढ़कर दस्तावेज मांग रही है। कितने रिलीव हुए, कितनों ने ज्वाइन किया, कौन अब भी पुरानी जगह है और क्यों है। यही चार सवाल 30 सितंबर के बाद उत्तराखंड वन विभाग के तबादलों की पूरी तस्वीर सामने ला सकते हैं।

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