हजूर 👉युवा DFO की कुर्सी पर घमासान!
हजूर 👉महज 40-50 दिन की तैनाती👉तबादले की सुगबुगाहट ने हरित महकमे में बढ़ाई हलचल?
हजूर 👉 उत्तराखंड के एक बेहद संवेदनशील मैदानी वन प्रभाग में इन दिनों जंगल और वन्यजीवों से ज्यादा चर्चा एक युवा DFO की कुर्सी की हो रही है। हरित महकमे के गलियारों में कानाफूसी तेज है कि एक प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियत और युवा वन अधिकारी के बीच किसी विभागीय मामले को लेकर तल्खी पैदा हुई और बात स्थानीय स्तर से निकलकर देहरादून तक पहुंच गई। चर्चा तो यहां तक है कि साहब को प्रभाग की कमान संभाले अभी जुम्मा-जुम्मा 40-50 दिन ही हुए हैं, लेकिन अब उनकी कुर्सी को लेकर नई अटकलों ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि इस कथित घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
हजूर 👉 कहानी का असली मसाला यही है कि आखिर इतनी कम अवधि में ऐसा क्या हुआ कि नई जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी की कुर्सी ही चर्चा का केंद्र बन गई? हरित महकमे के जानकारों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हैं👉कोई इसे सामान्य प्रशासनिक फेरबदल मान रहा है तो कोई किसी कथित विभागीय टकराव से जोड़कर देख रहा है। मगर बिना शासनादेश के किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि इस कथित घटनाक्रम ने महकमे के भीतर बैठे अफसरों और कर्मचारियों की निगाहें राजधानी की तरफ जरूर कर दी हैं।
हजूर 👉 संवेदनशील मैदानी प्रभाग की कमान संभालना कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं। अवैध कटान, वन्यजीव अपराध, खनन, वनभूमि से जुड़े मामले और विभागीय व्यवस्था की असल तस्वीर समझने में किसी भी नए अधिकारी को वक्त लगता है। ऐसे में अगर किसी DFO की तैनाती के कुछ ही सप्ताह बाद तबादले की चर्चा शुरू हो जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है👉क्या यह महज प्रशासनिक जरूरत है, या इसके पीछे कोई ऐसी कहानी है जिसकी फाइल अभी पर्दे के पीछे चल रही है?
हजूर 👉 वैसे भी इस समय हरित महकमे में तबादलों को लेकर माहौल गर्म है। स्थानांतरण आदेशों के अनुपालन की समयसीमा को लेकर शासन और विभागीय स्तर पर सख्ती दिखाई जा रही है। ऐसे माहौल में एक युवा DFO के संभावित तबादले की सुगबुगाहट ने कहानी को और दिलचस्प बना दिया है। अब महकमे में निगाहें इस बात पर हैं कि अगर तबादला आदेश आता है तो उसमें क्या वजह दर्ज होगी और अगर आदेश नहीं आता तो फिर इतनी तेज चली इस चर्चा की चिंगारी आखिर उठी कहां से?
हजूर 👉 फिलहाल मामला चर्चा और शासनादेश के बीच झूल रहा है। न कथित राजनीतिक टकराव की कोई आधिकारिक पुष्टि हुई है और न ही इस युवा अधिकारी के तबादले का कोई नया आदेश सामने आया है। लिहाजा अभी फैसला अटकलों से नहीं, शासन की कलम से होगा। लेकिन अगर आने वाले दिनों में राजधानी से तबादले की फाइल निकलती है, तो महज 40-50 दिन की तैनाती और उसके पीछे की पूरी कहानी हरित महकमे के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बनने वाली है। कुर्सी पर साहब कायम रहेंगे या नई नेमप्लेट लगेगी👉अब नजर देहरादून की कलम पर है।



