जंगल जासूस 👉
हजूर 👉बिनसर की वादियों की आत्मा बनेगा नया प्रतीक चिह्न👉 जन-भागीदारी से गढ़ा जाएगा आधिकारिक ‘चेहरा’!
हजूर 👉 उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की वादियों में स्थित बिनसर वन्यजीव विहार अपनी असीम प्राकृतिक सुंदरता, घने बांज-देवदार के जंगलों, दुर्लभ वन्यजीवों, कल-कल बहते जलस्रोतों और समृद्ध सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासत के लिए दुनिया भर के प्रकृति प्रेमियों के दिलों में बसता है। बिनसर की इस पूरी कहानी में असली ट्विस्ट यही है कि जिस जंगल ने सदियों से अपनी खूबसूरती से लाखों दिलों को बांधा, वह आज तक कागजों पर बिना किसी ‘चेहरे’ या ‘ब्रांड’ के चल रहा था। देवदार और बांज के अभेद्य जंगलों से घिरी इस हसीन वादी के पास सब कुछ था👉हिमालय की बर्फीली चोटियों का नज़ारा, दुर्लभ वन्यजीवों की चहलकदमी और सदियों पुराना इतिहास। लेकिन जब बात आधिकारिक पहचान की आती थी, तो सरकारी महकमे के पास कोई एक ऐसा प्रतीक चिह्न यानी लोगो तक नहीं था जिसे देखकर दुनिया कह सके कि यह बिनसर की अपनी अलग पहचान है।
हजूर 👉 अब सिविल सोयम वन प्रभाग, अल्मोड़ा के प्रभागीय वनाधिकारी प्रदीप धौलाखंडी की अगुवाई में वन महकमे ने बिनसर को उसका वही ‘चेहरा’ देने का मास्टरस्ट्रोक खेला है। विभाग की मंशा केवल कोई आकर्षक या आधुनिक ग्राफिकल डिजाइन तैयार करने की नहीं है, बल्कि एक ऐसा लोगो सामने लाने की है जिसे देखते ही बिनसर की संपूर्ण भौगोलिक, जैविक और सांस्कृतिक छवि आंखों के सामने तैरने लगे। इस पहचान को गढ़ने का जिम्मा किसी बंद कमरे में बैठे सरकारी बाबुओं तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसके दरवाजे सीधे जनता, छात्रों, कलाकारों, ग्राफिक डिजाइनरों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए खोल दिए गए हैं।
हजूर 👉 इस रचनात्मक मुकाबले में प्रतिभागियों को अपने द्वारा तैयार किए गए लोगो के साथ लगभग 100 शब्दों में उसकी मूल अवधारणा और बिनसर की पहचान से उसके जुड़ाव को भी स्पष्ट करना होगा। प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रतीक चिह्न के लिए 10,000 रुपये की पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। हालांकि 10,000 रुपये का इनाम तो बस एक जरिया है, असली होड़ तो बिनसर के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की है। अपनी कला और कल्पना को बिनसर की आत्मा से जोड़ने वाले प्रतिभागियों के लिए यह एक बड़ा और सुनहरा अवसर माना जा रहा है।
हजूर 👉 अब पूरी प्रक्रिया की समय-सारणी पर नजर डालें तो 30 सितंबर 2026 की शाम 5 बजे तक ई-मेल के माध्यम से डिजाइन जमा किए जा सकते हैं। विभागीय वेबसाइट पर 19 सितंबर 2026 की तारीख के साथ इस संबंध में प्रेस विज्ञप्ति सार्वजनिक की गई थी, जिसके बाद से ही डिजाइन जगत और पर्यावरण प्रेमियों में इसे लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है। यदि सब कुछ तय समय-सारणी के अनुसार आगे बढ़ता है, तो चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद आगामी अक्टूबर महीने में बिनसर के इस नए और आधिकारिक प्रतीक चिह्न का औपचारिक अनावरण कर दिया जाएगा।
हजूर 👉 देश के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों की तर्ज पर बिनसर का यह नया ब्रांड चेहरा भविष्य में विभागीय दस्तावेजों, सूचना पट्टों, जागरूकता अभियानों और पर्यटन प्रचार सामग्री की मुख्य पहचान बनेगा। जब इस प्रतीक चिह्न का पर्दा उठेगा, तब देखना यह होगा कि क्या डिजाइनर इसमें बिनसर के पेड़ों की छांव, वन्यजीवों की दहाड़, प्राकृतिक जलस्रोतों और सांस्कृतिक धरोहर को एक साथ समेट पाते हैं या नहीं। यह एक छोटा सा चिन्ह आने वाले दशकों तक बिनसर की शान बनकर पूरी दुनिया के सामने चमकेगा।
हजूर 👉 लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के साथ-साथ चयन प्रणाली की पारदर्शिता बनाए रखना भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। जब किसी संरक्षित क्षेत्र को पहली बार आधिकारिक लोगो मिलने जा रहा हो, तो उसकी चयन प्रक्रिया पर सबकी निगाहें टिकना स्वाभाविक है। प्रतियोगिता में आए कुल आवेदनों के निष्पक्ष मूल्यांकन, चयन के स्पष्ट मानकों और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया को सार्वजनिक विश्वास की कसौटी पर खरा उतरना होगा। कितने प्रस्ताव आए और किस आधार पर अंतिम विजेता चुना गया, यह पारदर्शिता ही इस पहल की साख तय करेगी।
हजूर 👉 आखिरकार सवाल सिर्फ 10,000 रुपये के इनाम या एक साधारण ग्राफिकल डिजाइन का नहीं है, बल्कि बिनसर की आत्मा को एक स्थायी प्रतीक में ढालने का है। 30 सितंबर की शाम तक आने वाले डिजाइनों के बाद चयन का दौर शुरू होगा और अक्टूबर में बिनसर को उसकी नई पहचान मिलेगी। अब देखना यह है कि कौन सा प्रतीक बिनसर के घने जंगलों, वन्यजीवों और हिमालयी विरासत की कहानी को सबसे प्रभावी ढंग से बयां करने में कामयाब होता है।



