जंगल जासूस 👉
हजूर 👉दार्जिलिंग से जापान तक ‘पहाड़ों के भूत’ की बड़ी योजना👉फाइलों में दर्ज हुआ आनुवंशिक कूटनीति का नया अध्याय
हजूर 👉दार्जिलिंग की बर्फीली वादियों में इन दिनों ठंड से ज्यादा गर्माहट एक ऐसे रहस्य की है, जिसने पूरी वन्यजीव दुनिया में सनसनी फैला दी है। कागजों पर आंकड़े बताते हैं कि पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क के टोपकेदारा स्थित हिम तेंदुआ प्रजनन केंद्र में कुल 13 हिम तेंदुए मौजूद हैं, जिनमें पांच नर और आठ मादाएं शामिल हैं। देखने में यह आंकड़ा किसी भी संरक्षण केंद्र के लिए बड़ी कामयाबी लग सकता है, लेकिन जब पड़ताल की नजर इस गिनती के पीछे उतरती है तो मामला सीधा नहीं दिखता। असली खेल जानवरों की संख्या का नहीं, बल्कि उन अदृश्य जीन की वंशावली का है जो आने वाली पीढ़ियों की किस्मत तय करते हैं। दार्जिलिंग के इन हिम तेंदुओं की जड़ें मुख्य रूप से सिक्किम की आनुवंशिक रेखा से जुड़ी रही हैं। दशकों से सीमित दायरे में एक ही कुनबे के भीतर प्रजनन होने के कारण अब वहां आनुवंशिक एकरसता का गहरा साया मंडराने लगा है। विज्ञान की भाषा में इसे इनब्रीडिंग डिप्रेशन कहते हैं। जब एक ही वंश के भीतर बार-बार प्रजनन होता है तो हानिकारक आनुवंशिक लक्षण हावी होने लगते हैं, जिससे जानवरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता, शारीरिक बनावट और प्रजनन शक्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।
हजूर 👉इसी वैज्ञानिक संकट से निपटने के लिए पर्दे के पीछे एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का ताना-बाना बुना जा रहा है। बातचीत का यह दौर सीधे दार्जिलिंग से जापान के टोक्यो स्थित मशहूर तामा जू तक जा पहुंचा है। योजना के मुताबिक जापान से एक मादा हिम तेंदुआ दार्जिलिंग लाई जा सकती है और बदले में दार्जिलिंग से एक मादा हिम तेंदुआ जापान भेजी जा सकती है। यह केवल दो चिड़ियाघरों के बीच जानवरों का साधारण आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि पहाड़ों के इस सबसे रहस्यमयी शिकारी की नस्ल को बचाने के लिए रची गई एक बेहद चतुर और वैज्ञानिक चाल है। मकसद साफ है कि जापान के हिम तेंदुए के नए जीन को दार्जिलिंग के कुनबे में मिलाकर यहां की आबादी को एक नया जैविक आधार और मजबूती दी जाए।
हजूर 👉यह कहानी सिलीगुड़ी के बंगाल सफारी पार्क की उस पुरानी घटना की याद दिलाती है, जहां रॉयल बंगाल टाइगर के प्रजनन कार्यक्रम में भी सीमित वंशावली का ऐसा ही पेच फंसा था। उस समय पार्क में मौजूद बाघों के बीच नजदीकी आनुवंशिक रिश्ता होने के कारण अलीपुर चिड़ियाघर से एक नई बाघिन लाकर उस खून के घेरे को तोड़ा गया था। जिस तरकीब का फायदा बाघों के मामले में देखा गया, ठीक वही मास्टरप्लान अब हिम तेंदुओं के लिए आजमाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल के वन मंत्री मनोज उरांव ने भी इस बात की पुष्टि की है कि लंबे समय तक एक ही वंश में प्रजनन होने से शारीरिक और आनुवंशिक जोखिम पैदा हो जाते हैं। इसी खतरे को टालने और दार्जिलिंग के प्रजनन केंद्र में नया आनुवंशिक खून शामिल करने के लिए टोक्यो के साथ फाइलों का आदान-प्रदान तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हजूर 👉हालांकि दार्जिलिंग से जापान तक के इस रास्ते में कागजी और प्रशासनिक अड़चनों का एक बड़ा पहाड़ खड़ा है। दो अलग-अलग देशों के बीच वन्यजीवों की इस अदला-बदली के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों की लंबी फेहरिस्त पार करनी होती है। कड़े पशु स्वास्थ्य परीक्षण, संगरोध की अवधि, परिवहन के विशेष इंतजाम और संबंधित सरकारी प्राधिकरणों की हरी झंडी मिले बिना यह योजना हकीकत का रूप नहीं ले सकती। इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि दार्जिलिंग से जापान जाने वाली मादा का चुनाव किस आधार पर होगा और जापान से आने वाली मेहमान क्या सच में यहां की भावी पीढ़ियों को अपेक्षित आनुवंशिक मजबूती दे पाएगी। प्रकृति के खुले माहौल में ऊंचे और बर्फीले पहाड़ों पर रहने वाला हिम तेंदुआ अपनी मोटी खाल, धूसर-सफेद रंग और लंबी पूंछ के दम पर चट्टानों के बीच लगभग गायब रहने के लिए जाना जाता है। खुले जंगलों में प्रकृति खुद आनुवंशिक संतुलन बनाए रखती है, लेकिन कैद में वही जिम्मेदारी वैज्ञानिकों और चिड़ियाघर प्रबंधन के कंधों पर आ जाती है। दार्जिलिंग के टोपकेदारा में मौजूद 13 हिम तेंदुए केवल प्रदर्शनी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे एक पूरी प्रजाति के भविष्य की डोर थामे हुए हैं। अगर जापान वाली यह योजना अपनी मंजिल तक पहुंचती है, तो यह केवल एक विदेशी जानवर का आगमन नहीं होगा, बल्कि हिमालय के इस ‘पहाड़ों के भूत’ की आने वाली नस्लों के लिए एक बेहद मजबूत और नई आनुवंशिक शुरुआत होगी।



