हजूर 👉डिपो में सागौन गायब, पंजे खामोश और महकमे पर सवाल👉11 दिन बाद भी 20 गिल्टों का कोई सुराग नहीं, हजूर कौन देगा जबाब?

जंगल जासूस 👉 

हजूर 👉डिपो में सागौन गायब, पंजे खामोश और महकमे पर सवाल👉11 दिन बाद भी 20 गिल्टों का कोई सुराग नहीं, हजूर 👉कौन देगा जबाब?

हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के कालाढूंगी प्रथम डिपो से सागौन के गिल्टे गायब हुए पूरे 11 दिन बीत चुके हैं, लेकिन महकमे के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है! तारीख 30 सितंबर 2026 के आसपास का यह वो काला कारनामा है, जब डिपो की चारदीवारी और पहरेदारी के नाक के नीचे से करीब 20 भारी-भरकम सागौन के लट्ठे रातों-रात गायब हो गए। इन वीआईपी गिल्टों की कीमत कोई दो कौड़ी की नहीं, बल्कि लाखों रुपये की है। डिपो के अपने जिम्मेदार नुमाइंदे कैलाश चंद्र पटेलिया भी यह कुबूल कर चुके हैं कि डेढ़ दर्जन से ज्यादा सागौन के लाडले लट्ठे डिपो से हवा हो चुके हैं, जिसके बाद पुलिस और उच्चाधिकारियों को सिर्फ कागजी खानापूरी वाली तहरीर थमा दी गई है। लेकिन सबसे बड़ा और चीखता हुआ सवाल यह है कि जिस सरकारी डिपो के चप्पे-चप्पे पर नजर होनी चाहिए और परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां से इतनी भारी मात्रा में लकड़ी गायब होने की यह नौबत आखिर कैसे आ गई?

हजूर 👉 अब जरा इस कहानी के उस सबसे खतरनाक और मसालेदार हिस्से पर आइए, जहां एंट्री होती है डिपो परिसर में धड़ल्ले से घूमने वाले उन भारी-भरकम ‘पंजों’ और ‘हेड्रा मशीनों’ की! अंदरखाने के पुख्ता सूत्रों का दावा है कि कालाढूंगी डिपो के भीतर बिना किसी वैध अनुमति या सरकारी परमिशन के इन मशीनों का काला खेल लंबे समय से बेखौफ चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब डिपो के भीतर लाखों की लकड़ी चोरी होने का यह सनसनीखेज मामला सामने आ चुका है, तो इन संदिग्ध मशीनों की भूमिका, उनकी आवाजाही और उनके संचालन का काला चिट्ठा जांच के दायरे में क्यों नहीं लाया जा रहा? चर्चा यह भी है कि पूर्व में इसी डिपो के भीतर पंजा चलने के मामले पर किसी आरटीओ अधिकारी ने अपनी दबिश का हंटर भी चलाया था, हालांकि कुछ लोग यह तर्क देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं कि वह पुराना मामला अलग था। लेकिन हजूर, पुराना मामला अलग हो या नया, असली सवाल यह है कि आज डिपो के भीतर जो मशीनें गरज रही हैं, उनके कागजात कहां हैं? उनकी अनुमति किसने दी? और किसकी शह पर इन पंजों का इस्तेमाल करके लकड़ी के रास्तों को सुगम बनाया जा रहा था? डिपो में सिर्फ सागौन का हिसाब नहीं खुलेगा, बल्कि इन मशीनों के घूमने का एक-एक सेकंड का रिकॉर्ड भी अब बाहर आना ही चाहिए!

हजूर 👉 और अब वही सबसे तीखा और चुभता हुआ सवाल, जो इस पूरे प्रकरण को पत्रकारिता की असली धार देता है👉क्या सागौन के इन गिल्टों का गायब होना किसी साधारण चोरी का नतीजा है या यह उसी कथित ‘पंजे’ और मशीनरी की शातिराना करतूत का नतीजा है? याद रखिए, यह कोई हवा में लगाया गया साबित आरोप नहीं, बल्कि वह सुलगा हुआ सवाल है जिसका जवाब बिना सीसीटीवी फुटेज के पन्ने पलटे, बिना गेट के मूवमेंट रजिस्टरों की चीरफाड़ किए और बिना स्टॉक की पुरानी-नई फाइलों को खंगाले नहीं मिलने वाला। अगर गिल्टे सचमुच चोरी हुए हैं, तो वे डिपो की मजबूत चारदीवारी को लांघकर बाहर किस रास्ते और किस गाड़ी में लदकर निकले? यदि स्टॉक में लकड़ी पहले से कम थी, तो यह बात इतने दिनों तक दबा क्यों रही? और अगर इसमें किसी स्तर पर चूक है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कब होगी?

हजूर 👉 जब इस पूरे घपले के तारों को जोड़ने और इस काली करतूत की तह तक पहुंचने के लिए प्रभागीय विक्रय प्रबंधक मुदित आर्या से मोबाइल के जरिए संपर्क साधने की बार-बार कोशिश की गई, तो उधर से सिर्फ सन्नाटा बोल गया। फोन की घंटियां लगातार बजती रहीं, लेकिन किसी ने कॉल रिसीव करने की जहमत तक नहीं उठाई। इस चुप्पी ने इस मामले को और अधिक संदिग्ध और गंभीर बना दिया है। हालांकि, जैसे ही उनका कोई आधिकारिक पक्ष सामने आएगा, उसे भी पूरी प्रमुखता दी जाएगी। लेकिन तब तक, वन निगम के इन हुक्मरानों और कुर्सी पर बैठे बड़े अफसरों के सामने अपनी साख बचाने की दोहरी मुसीबत खड़ी है👉एक तरफ गायब सागौन के एक-एक गिल्टे का हिसाब देना है, तो दूसरी तरफ डिपो के भीतर चल रहे इन अवैध पंजों और सुरक्षा के ढोल की पोल खुलने के बाद जनता को जवाब देना है। हजूर, 11 दिन बीत चुके हैं, डिपो में सागौन के गिल्टे मिल नहीं रहे, पंजों और हेडरा मशीनों की धूम पर सवाल खड़े हो चुके हैं और इस गड़बड़ी की गंध अब पूरे महकमे में फैल चुकी है👉अब देखना सिर्फ यह है कि जांच की यह धार इन सफेदपोशों की गर्दन तक पहुंचती है या यह पूरा सनसनीखेज मामला एक बार फिर फाइलों के उसी शातिराना पंजे में फंसकर हमेशा के लिए दम तोड़ देता है!

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