हजूर 👉देहरादून जू में फिर लौटा काल👉 250 पेड़ों की बलि के बाद भी ‘होपलो’ का तांडव जारी, बैकफुट पर आया वन महकमा!

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉देहरादून जू में फिर लौटा काल👉 250 पेड़ों की बलि के बाद भी ‘होपलो’ का तांडव जारी, बैकफुट पर आया वन महकमा!

हजूर, 👉 उत्तराखंड के जंगलों में अपनी भयंकर और जानलेवा तबाही से वन महकमे की रातों की नींद उड़ाने वाला खतरनाक साल बोरर यानी ‘होपलो’ कीड़ा अब सीधे राजधानी के देहरादून चिड़ियाघर तक जा पहुंचा है। इस प्राकृतिक और वन्यजीव परिसर में मौजूद बेहद कीमती, विशालकाय और साल पुराने पेड़ों पर इस कीड़े का हमला इतना ज्यादा भयावह है कि चिड़ियाघर प्रशासन से लेकर वन विभाग के तमाम आला अधिकारियों के पसीने छूट गए हैं। घने और हरे-भरे पेड़ों से समृद्ध इस सुंदर परिसर में कीड़े की अचानक हुई इस दोबारा वापसी ने न सिर्फ चिड़ियाघर के प्राकृतिक संतुलन और पारिस्थितिकी को तहस-नहस कर दिया है, बल्कि वहां आने वाले पर्यटकों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

हजूर, 👉 विशालकाय पेड़ों के तनों को अंदर ही अंदर पूरी तरह खोखला करके पाउडर में तब्दील कर देने वाला यह आदमखोर कीड़ा वन महकमे के लिए कोई नया सिरदर्द नहीं है। इससे पहले भी इसी चिड़ियाघर परिसर में कीड़े के भयंकर प्रकोप के चलते करीब 250 बहुमूल्य और हरे-भरे पेड़ों पर बेरहमी से कुल्हाड़ी चलानी पड़ी थी। उस वक्त विभागीय अधिकारियों ने बड़े-बड़े दावे करते हुए कहा था कि प्रभावित पेड़ों को हटाकर इस घातक संक्रमण पर पूरी तरह से लगाम कस दी गई है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर सैकड़ों पेड़ों की बलि दिए जाने के बावजूद दोबारा चिड़ियाघर के प्रमुख पेड़ों में कीड़े के खौफनाक लक्षण मिलने से विभागीय दावों और उनकी कागजी तैयारियों की पूरी तरह पोल खुल गई है।

हजूर, 👉 देहरादून जिले के रायपुर समेत तमाम आसपास के वन क्षेत्रों में यह कीड़ा पहले ही अपना विकराल रूप दिखा चुका है, जहां मजबूरी में वन विभाग को भारी संख्या में पेड़ों का कटान करवाना पड़ा था। वन विभाग के अधिकारी प्रभावित इलाकों की लगातार मॉनिटरिंग और पैनी निगरानी का खोखला राग तो अलाप रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि संक्रमण का दायरा घटने के बजाय दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक पेड़ों को संक्रमण के स्तर के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर इलाज या कटाई का फैसला लिया जाता है। जिन पेड़ों को पहले बचाने की उम्मीद में श्रेणी तीन और चार में रखा गया था, शायद उन्हें इस कीड़े ने अनुमान से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया है, जिसके कारण अब दोबारा उन पर कुल्हाड़ी चलाने की नौबत आ पहुंची है।

हजूर, 👉 अब वन महकमे के सामने सबसे बड़ी और कड़वी चुनौती चिड़ियाघर के बाकी बचे सैकड़ों हरे-भरे और साल पुराने पेड़ों को इस जानलेवा संक्रमण से सुरक्षित बचाने की खड़ी हो गई है। यदि समय रहते इस दिशा में कोई ठोस, वैज्ञानिक और व्यावहारिक कदम नहीं उठाया गया, तो जू का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ने के साथ-साथ वहां घूमने आने वाले हजारों पर्यटकों की सुरक्षा पर भी सीधा खतरा मंडराने लगेगा। जिस तरह से इस अदृश्य कीड़े ने चिड़ियाघर की ऊंची दीवारों को फांदकर दोबारा दबे पांव दस्तक दी है, उसने विभाग के पूरे सर्विलांस सिस्टम, सुरक्षा दावों और मॉनिटरिंग कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

 

हजूर, 👉 चिड़ियाघर के बेशकीमती पेड़ों में दोबारा दिखे इस दीमक रूपी खतरे ने अब जिम्मेदार अधिकारियों को जवाब देने की स्थिति में भी नहीं छोड़ा है। एक तरफ जहां पहले ही ढाई सौ से ज्यादा पुराने पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है, वहीं दूसरी तरफ बाकी बचे पेड़ों पर मंडराता यह भयानक खतरा साफ बता रहा है कि शुरुआती दौर में बरती गई लापरवाही अब कितनी भारी पड़ रही है। देखना होगा कि नींद में सो रहा वन महकमा अब भी जागकर चिड़ियाघर के अस्तित्व को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है या फिर इन ऐतिहासिक और घने पेड़ों को यूं ही तिनका-तिनका होकर पाउडर बनते देखता रहता है।

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