हजूर 👉एक रुपये का टेंडर फेल, फिर भी डिपो में गरज रहा हाइड्रोलिक पंजा👉कालाढूंगी के महा-घपले का काला सच!

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉एक रुपये का टेंडर फेल, फिर भी डिपो में गरज रहा हाइड्रोलिक पंजा👉कालाढूंगी के महा-घपले का काला सच!

हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के कालाढूंगी डिपो में इन दिनों जो काली करतूतों का चक्रव्यूह रचा गया है, उसने विभागीय नियमों, ठेकेदारी की मर्यादा और ईमानदारी के दावों की ऐसी धज्जियां उड़ाई हैं कि महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डिपो के सन्नाटे को चीरती हुई जिन मशीनों की गूंज सुनाई दे रही है, वे कोई साधारण गाड़ियां नहीं हैं, बल्कि वे लोहे के विशालकाय हाइड्रोलिक पंजे हैं जो मजदूरों के पसीने और हाथों की मेहनत को खुलेआम रौंद रहे हैं। दिन के उजाले में बेखौफ घूमती ये मशीनें लकड़ी के मोटे-मोटे गिल्टों और लट्ठों को ट्रकों में ऐसे भूसे की तरह भर रही हैं, मानो यहाँ कोई सरकारी कानून नहीं बल्कि किसी भूमाफिया की निजी जागीर चल रही हो। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इन मशीनों और ट्रैक्टर-लोडरों के डिपो के भीतर आने या बाहर जाने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या गेट एंट्री तक मौजूद नहीं है। बिना किसी कागजी इंद्राज के डिपो के भीतर इन पंजों का धड़ल्ले से दाखिल होना और तांडव मचाना साफ इशारा करता है कि सारा खेल बिना किसी डर के चलाया जा रहा है।

हजूर 👉 इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और हैरान करने वाला पेंच वह कारनामा है, जिसकी चर्चा हर चौराहे पर हो रही है। किस्सा कुछ यूं है कि पिछले साल कालाढूंगी डिपो में लकड़ी की ग्रेडिंग और लोडिंग के नाम पर बाकायदा निविदाएं यानी टेंडर मांगे गए थे, जिसमें एक ठेकेदार ने अपनी चालाकी दिखाते हुए महज एक रुपये की दर भरकर पूरे खेल का नक्शा ही बदल डाला। जब एक रुपये की ऐसी अटपटी और हास्यास्पद दर पर टेंडर सामने आया, तो विभाग ने कागजी खानापूर्ति करते हुए उसे तुरंत निरस्त कर दिया। लेकिन यहीं से इस महा-घपले की असली पटकथा लिखी जाती है, क्योंकि जब मुख्य टेंडर ही खारिज हो गया था, तो विभाग को नए सिरे से पारदर्शी निविदाएं बुलानी चाहिए थीं, मगर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

हजूर 👉 असली थ्रिलर और विभागीय मिलीभगत का खेल तो यहीं से शुरू होता है कि जब पिछले साल का वह एक रुपये वाला टेंडर पूरी तरह फेल होकर रद्द हो चुका था, तो फिर आज पिछले एक साल से उसी सड़े हुए और अवैध सिस्टम के सहारे डिपो के भीतर यह काम कैसे चल रहा है? महकमे के नुमाइंदे इसे पुरानी चली आ रही व्यवस्था का नाम देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह कोई पुरानी परंपरा नहीं बल्कि एक नया और शातिर खेल है। जब कोई वैध वार्षिक अनुबंध ही वजूद में नहीं है, जब नया कार्यादेश जारी नहीं हुआ है, और जब पुराना टेंडर कागजों में दम तोड़ चुका है, तो फिर इन हाइड्रोलिक पंजों को डिपो के भीतर तांडव मचाने की खुली छूट किसने दे दी?

हजूर 👉 यह कोई इकलौता या पहला वाकया नहीं है, बल्कि पूरा सिंडिकेट पहले भी कई बार बेनकाब हो चुका है। पिछले साल रामनगर डिपो से लकड़ी भरकर निकले एक ट्रक का पीछा जब सत्ताधारी पार्टी के एक नेता ने किया और वन विभाग की टीम ने उसे पकड़ा, तो ट्रक में तय सीमा से कहीं ज्यादा लकड़ी का माल लदा मिला। जाँच में साफ हुआ कि माल मजदूरों ने नहीं, बल्कि ट्रैक्टर में लगे इसी लोडर पंजे ने भरा था। ऐसा ही कारनामा चाँदनी डिपो में भी सामने आया था, जब तत्कालीन कुमाऊँ महाप्रबंधक वन निगम और कुमाऊँ मुख्य वन संरक्षक डॉ. धीरज पांडे को गुप्त सूचना मिली और उन्होंने तत्कालीन एसडीओ एसओजी किरण शाह को भेजकर ट्रक पकड़वाया। उस ट्रक में भी कई घन मीटर लकड़ी तय मात्रा से अधिक निकली। इतने बड़े-बड़े प्रशासनिक भंडाफोड़ों के बावजूद आज भी चाँदनी, रामनगर और कालाढूंगी डिपो में बेधड़क ट्रैक्टर-पंजे गरज रहे हैं, जो सीधे तौर पर उच्च अधिकारियों की शह की ओर इशारा करते हैं।

हजूर 👉 इस काले कारोबार का सबसे दर्दनाक और भयानक सच श्रमिकों के हक पर चलाया जा रहा वह डाका है, जो कागजों की कोख में पल रहा है। जब डिपो के भीतर लोडिंग का सारा काम इन लोहे की मशीनों और हाइड्रोलिक पंजों से कराया जा रहा है, तो फिर कागजों पर किन मजदूरों के नाम का मस्टर रोल चल रहा है? वे फर्जी मजदूर कौन हैं जिनके बैंक खातों में हर महीने सरकारी बजट डाला जा रहा है? हद तो तब हो जाती है जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत इन फर्जी मस्टर रोल और बैंक खातों की जानकारी मांगी जाती है, तो महकमा इसे ‘निजी सूचना’ का ढोंग रचकर खारिज कर देता है। अगर यह खुली साठगांठ, भ्रष्टाचार और लीपापोती नहीं है, तो फिर क्या है हजूर?

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