जंगल जासूस 👉
हजूर 👉कॉर्बेट में मंच पर जंगल बचाने की हुंकार, जमीन पर पर्यटन का वार! हजूर, भाषणों से बचेगा जंगल या पहले तय होगी उसकी कैरिंग कैपेसिटी?
हजूर 👉 कॉर्बेट में साहित्य और पर्यावरण का मंच सजा तो पद्मश्री पुष्पेश पंत, पद्मश्री अनूप साह और पद्मश्री शेखर पाठक जैसे दिग्गजों ने जंगल और प्रकृति की चिंता सामने रखी। मंच से सवाल उठा कि कॉर्बेट आखिर कितना पर्यटन दबाव सह सकता है। मगर असली सवाल मंच से नीचे उतरते ही खड़ा हो जाता है। मंच पर कैरिंग कैपेसिटी की चिंता है और जमीन पर बढ़ता पर्यटन दबाव। मंच पर जंगल को बचाने की बातें हैं और बाहर उसी जंगल को देखने के लिए बढ़ती जिप्सियां, वाहन और पर्यटकों की भीड़। पुष्पेश पंत ने कॉर्बेट को महज पर्यटन स्थल मानने वाली सोच पर सवाल उठाया तो अनूप साह ने नैनीताल और पहाड़ों में बढ़ते ट्रैफिक और पार्किंग के दबाव का उदाहरण दिया। यानी हुजूर, प्रकृति की क्षमता सीमित है, मगर पर्यटन की भूख का मीटर लगातार ऊपर जा रहा है।
हजूर 👉 पर्यटन की चमक का सबसे बदसूरत चेहरा प्लास्टिक के रूप में जमीन पर दिखाई देता है। अनूप साह ने पर्यटन क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे के जमीनी उदाहरण का जिक्र किया। पर्यटक आया, खाना खाया, बोतल और पैकेट पीछे छोड़ा और आगे निकल गया। कमाई का हिसाब पर्यटन कारोबारी और व्यवस्था रख लेती है, लेकिन प्रकृति पर छोड़े गए कचरे का हिसाब कौन रखेगा। दूसरी तरफ सीजन में नैनीताल जैसे इलाकों में वाहनों का दबाव और जाम बताता है कि पहाड़ की सड़कें भी अनंत क्षमता लेकर नहीं बनी हैं। सवाल पर्यटन बंद करने का नहीं है, सवाल यह है कि पर्यटन को जंगल और पहाड़ की क्षमता के मुताबिक चलाया जाएगा या फिर जंगल से हर साल यही कहा जाएगा कि हुजूर, थोड़ा और सह लीजिए।
हजूर 👉 पद्मश्री शेखर पाठक ने कॉर्बेट की तस्वीर को और बड़ा कर दिया। कॉर्बेट को केवल बाघों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। हिमालय के जंगल, जलागम, खेती और नीचे बहने वाली नदियां एक दूसरे से जुड़ी प्राकृतिक कड़ियां हैं। विजय धस्माना ने जंगल की उस दुनिया की याद दिलाई जिसे सफारी की जिप्सी अक्सर पीछे छोड़ देती है। कीड़े, मेंढक, सरीसृप, घास और पेड़ पौधे उसी पारिस्थितिक तंत्र की नींव हैं, जिसके शीर्ष पर बाघ दिखाई देता है। स्टीफन ऑल्टर ने भी इस सोच पर सवाल उठाया कि जंगल देखने की सफलता सिर्फ टाइगर साइटिंग से तय हो। वहीं कल्याण सिंह रावत और माधुरी बड़थ्वाल ने विकास, पलायन और लोक संस्कृति की चिंता सामने रखी। मतलब बात बाघ से शुरू हुई और पहुंच गई पहाड़, पानी, खेत, गांव और संस्कृति तक।
हजूर 👉 अब असली खेल मंच की रोशनी बुझने के बाद शुरू होगा। तीन दिन तक भाषण हुए, तालियां बजीं और जंगल बचाने की चिंता सामने आई। लेकिन अगला पर्यटन सीजन जब आएगा, तब वही सवाल फिर सामने होंगे। कितने वाहन जंगल और पर्यटन क्षेत्रों का दबाव सह सकते हैं। कितने पर्यटक किसी क्षेत्र की प्राकृतिक क्षमता के भीतर हैं। प्लास्टिक रोकने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। निर्माण और पर्यटन का दबाव कितना है। और सबसे बड़ा सवाल, मंच पर कही गई कैरिंग कैपेसिटी की बात क्या जमीन पर किसी ठोस नीति में बदलेगी। क्योंकि हुजूर, कॉर्बेट की असली विडंबना यही है कि मंच पर जंगल को बचाने की चिंता है और जमीन पर उसी जंगल की खूबसूरती पर बढ़ता दबाव। जंगल पर्यटन की सबसे बड़ी पूंजी है, मगर जंगल खुद कोई व्यापारी नहीं जो अपनी कीमत का बिल थमा सके। इसलिए अगर आज उसकी सीमा तय नहीं हुई तो कल हिसाब प्रकृति अपने तरीके से करेगी। उस दिन मंच पर कॉर्बेट की कहानी सुनाने वाले तो मिल जाएंगे, मगर सवाल यह होगा कि असली कॉर्बेट बचा कितना है।



