हजूर 👉53 दिन की कुर्सी और 12 साल का हिसाब? हजूर👉‘संजीवनी बूटी’ ने बचा ली कुर्सी?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉53 दिन की कुर्सी और 12 साल का हिसाब? हजूर👉‘संजीवनी बूटी’ ने बचा ली कुर्सी?

हजूर 👉 अरण्य के शांत माहौल में पेड़ों की छांव तले इन दिनों एक अलग ही किस्म का बारूद पक रहा है। जिस कुर्सी पर बैठे साहब को अभी जुम्मा-जुम्मा 53 दिन भी नहीं हुए, उसी कुर्सी के पाए उखाड़ने की पटकथा पर्दे के पीछे लिख दी गई। 53 दिन! हजूर, इतने वक्त में तो दफ़्तर का चपरासी भी साहब का मिज़ाज ठीक से नहीं समझ पाता, जंगलों के बीट और रेंजों का नक्शा तो दूर की बात है। मगर हुक्मरानों के दिल में अफ़सर की रवानगी का परवाना जारी करने की ऐसी बेताबी जागी कि नियम-कायदे सब धरे के धरे रह गए। कांतार की हवा में तैरता यही सवाल हर किसी के ज़हन में कौंध रहा है कि आख़िर 53 दिन की इस छोटी सी मियाद में ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा जो साहब की विदाई तय की जाने लगी?

हजूर 👉 कहते हैं कि सत्ता की गलियों में सच बोलने की एक बड़ी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। महकमे के भीतर की कानाफूसी बताती है कि साहब का कसूर सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने एक माननीय जनप्रतिनिधि की चौखट पर नियम-क़ानून की किताब खोलकर साफ़ कह दिया👉हजूर, कायदे से यह काम नहीं हो सकता!’ बस, फिर क्या था? नियम का यह सीधा आइना हुक्मरानों की आँखों में मिर्च की तरह लगा। रसूख के गुरूर को एक अफ़सर की यह बेबाकी इतनी नागावार गुज़री कि तुरंत दरबार सजे, कान भरे गए और फ़ाइलों के घोड़ों को एड़ी लगा दी गई ताकि 53 दिन पुरानी इस कुर्सी को उखाड़ फेंका जाए। अब जंगल जासूस पूछता है कि अगर एक ज़िम्मेदार अफ़सर क़ानून की रखवाली नहीं करेगा, तो क्या कांतार का राज भू-माफियाओं और सिंडिकेट के हवाले कर दिया जाए?

हजूर 👉 सत्ता के गलियारों में तबादले का फरमान तैयार हो रहा था और साहब का बोरिया-बिस्तर समेटने की पूरी तैयारी थी, लेकिन तभी कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरे महकमे के होश उड़ा दिए। न्याय के मंदिर ने अचानक आँखें खोलीं और राज्य में अफ़सरों की अदला-बदली के इस पूरे खेल पर पिछले पूरे 12 सालों का कच्चा-चिट्ठा तलब कर लिया! न्याय के मंदिर का यह चाबुक चलना था कि सत्ता के कमरों में सन्नाटा पसर गया। 53 दिन की कुर्सी पर लटक रही तबादले की तलवार के सामने न्याय के मंदिर का यह रुख़ किसी ‘संजीवनी बूटी’ की तरह आ खड़ा हुआ। अब मामला सिर्फ़ एक अफ़सर की कुर्सी का नहीं रहा, बल्कि पिछले एक दशक से मनमर्ज़ी से चलाए जा रहे तबादला उद्योग पर ही बहुत बड़ा सवालिया निशान लग गया है।

हजूर 👉 तबादला कोई विपिन की बेल पर लगा ऐसा जंगली फल तो है नहीं कि जब मन किया तोड़ लिया और जब मन चाहा दूसरी डाल पर टांग दिया! किसी भी पारदर्शी और ज़िम्मेदार शासन व्यवस्था में अफ़सर को हटाने के पीछे ठोस प्रशासनिक वजह, कार्यहित और तय कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए। अगर क़ानून की रक्षा करने और नियम का आइना दिखाने की सज़ा तबादला ही तय की जाएगी, तो फिर भू-माफिया, अवैध कटान और खनन सिंडिकेट पर नकेल कसने की हिम्मत कौन सा अफ़सर जुटाएगा? जब अफ़सरों को नियमों की ढाल ही नहीं मिलेगी, तो क़ानून की किताबें दफ़्तरों की अलमारी में सड़ेगी और ज़मीन पर सिंडिकेट का राज चलेगा।

हजूर 👉 इसीलिए विपिन की पगडंडी से शुरू हुई यह लड़ाई अब न्याय के मंदिर के गलियारों तक पहुँच चुकी है। पहले सवाल सिर्फ़ इतना था कि ‘साहब को क्यों हटाया जा रहा है?👉लेकिन अब सवाल यह बन चुका है कि ‘बीते 12 सालों में तबादलों की पूरी नीति क्या रही है?’ दफ़्तर के बंद लॉकरों में रखी फ़ाइलों की एक ख़ासियत होती है हजूर 👉वे न किसी के दबाव में आती हैं, न किसी से डरती हैं। वे बस तारीख़ें और आदेश दर्ज करके ख़ामोश बैठी रहती हैं। मगर जब न्याय का मंदिर हिसाब मांगता है, तो वही ख़ामोश फ़ाइलें पन्ने पलट-पलट कर सच बोलने लगती हैं।

हजूर 👉 53 दिन की कुर्सी अब अकेली नहीं है, उसके पीछे 12 सालों का दस्तावेज़ी इतिहास खड़ा हो गया है। अगर आदेश आता है तो कारण बताना होगा, और अगर आदेश रुकता है तो भी उठते सवालों का जवाब देना होगा। जंगल जासूस की नज़र अब महज़ तबादले के कागज़ पर नहीं, बल्कि उस कागज़ के पीछे छिपे असली अफ़साने पर है। आख़िर में बस इतना ही👉पेड़ गिरने की आहट तो सिर्फ़ अरण्य तक सीमित रहती है, लेकिन जब अफ़सर की कुर्सी हिलती है तो उसकी गूँज बहुत दूर तक जाती है। अब देखना यह है कि यह ‘संजीवनी बूटी’ केवल 53 दिन की कुर्सी बचाती है या 12 सालों के इस पूरे ताने-बाने से पर्दा उठाती है।

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