जंगल जासूस 👉
हजूर 👉रिसॉर्ट के मखमली लॉन में डूबी साहित्य की कलम👉 कॉर्बेट की असली कहानी या टूरिज्म का नया लग्जरी पैकेज?
हजूर👉कॉर्बेट की वादियों में इन दिनों पन्ने फड़फड़ा रहे हैं, मंच पर माइक चहक रहे हैं और जंगल की कहानियों की बड़ी भारी चाशनी घोली जा रही है। कहा जा रहा है कि दुनिया अब कॉर्बेट को सिर्फ बाघ, शिकार और सफारी से नहीं, बल्कि ‘साहित्य’ के चश्मे से देखेगी। वाह हजूर, सुनने में तो बात इतनी मीठी है कि कान में मिठास आ जाए! मगर पत्रकार का काम मीठी चाय में डुबकी लगाना नहीं, चाय की पत्ती तक जाकर कड़वाहट परखना होता है। जब इस लिटरेचर फेस्टिवल के पीछे का पन्ना पलटा गया, तो मालूम पड़ा कि इस पूरे ‘साहित्यिक महाकुंभ’ का ठिकाना कॉर्बेट की कोई कच्ची पगडंडी नहीं, बल्कि The Golden Tusk, The Riverview Retreat और Aahana Resort & Spa जैसे आलीशान रिसॉर्ट्स के मखमली लॉन हैं। अब आप ही बताइए हजूर👉जब साहित्य रिसॉर्ट के एयर-कंडीशन में बैठकर लिखा जाएगा, तो उसमें जंगल की मिट्टी की महक आएगी या फिर रूम फ्रेशनर की?
हजूर👉 बड़े-बड़े मंचों से दहाड़-दहाड़कर कहा जा रहा है कि कॉर्बेट की अनकही कहानियां अब दुनिया तक पहुंचेंगी। बात तो सौ टके टंच है, लेकिन सवाल तो यह है कि इन कहानियों के असली किरदार कहां हैं? क्या उस वनकर्मी को बुलावा आया जो 40 डिग्री धूप में बिना जूते जंगल में गश्त लगाता है? क्या उस नेचर गाइड को माइक मिला जो आपकी एक ढीली मुस्कान के लिए बाघ की लोकेशन ढूंढने में अपनी रीढ़ की हड्डी तुड़वा लेता है? या फिर उस गरीब ग्रामीण को मंच पर जगह मिली जिसके खेत में रोज रात को हाथी आ धमकता है और उसकी पूरे साल की मेहनत एक सांस में कुचल जाता है? हजूर, जब जंगल की कहानी सुनाने के लिए भी हजारों का पास, रिसॉर्ट का एंट्री गेट और वीआईपी तमगा जरूरी हो जाए, तो समझ लीजिए कि कहानी जंगल की नहीं, जंगल के नाम पर सजाए गए बाजार की हो रही है।
हजूर👉आंकड़े तो और भी मजेदार किस्सा सुनाते हैं। वर्ष 2025-26 में कॉर्बेट में 4,00,946 पर्यटकों ने कदम रखा और सरकारी खजाने में करीब 27.75 करोड़ रुपये का भारी-भरकम राजस्व टपक पड़ा। यानी कॉर्बेट अब सिर्फ पेड़ों और जानवरों का आशियाना नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा तगड़ा ‘बिजनेस मॉडल’ बन चुका है जहाँ हर सांस की कीमत वसूली जाती है। लेकिन जब चार लाख जोड़ी जूते जंगल की छाती पर पड़ेंगे, तो उसकी चीख तो निकलेगी ही। कूड़े के ढेर, गाड़ियों का धुआं, रिसॉर्ट्स का बजता डीजे और सूखते पानी के स्रोत👉इन सब पर तो खुद संसद की एक समिति ने माथा ठोकते हुए अपनी रिपोर्ट में गंभीर चिंता जताई है। यानी हजूर, ये सवाल किसी सिरफिरे की उपज नहीं हैं, ये वो कड़वी सच्चाइयां हैं जिन्हें मखमली कालीन के नीचे छुपाने की कोशिश की जा रही है।
हजूर👉 अगर किताबें सचमुच समाज का दर्पण हैं, तो कॉर्बेट के इस शीशे में सिर्फ रिसॉर्ट्स का फाइव-स्टार नजारा ही क्यों चमके? उसमें उस ग्रामीण का खौफ भी दिखना चाहिए जो सूरज ढलते ही अपने घर की सांकल चढ़ा लेता है। उसमें उस वनकर्मी के हाथ का छाला भी दिखना चाहिए जिसने जंगल को बचाने में अपनी उंगलियां कटवा लीं। उसमें उस गाइड की फटी जेब भी दिखनी चाहिए जो सीजन खत्म होते ही अगले चार महीने उधार पर काटता है। अगर यह सब नहीं दिख रहा, तो मान लीजिए कि जंगल पर साहित्य तो खूब रचा जा रहा है, लेकिन जंगल की असली रूह आज भी रिसॉर्ट की ऊंची दीवारों के बाहर सड़क किनारे खड़ी होकर अपना हक मांग रही है।
हजूर👉 सीधी-सादी बात यह है कि बात साहित्य से नफरत की नहीं है। साहित्य तो वो मशाल है जो घने अंधेरे में भी रास्ता दिखा दे। लेकिन अगर मशाल से सिर्फ रिसॉर्ट की सजावट रौशन हो और जंगल का अंधियारा जस का तस रहे, तो फिर टोकना पड़ेगा। अगर इस आयोजन से निकलकर कोई नीति बनती, ग्रामीण को सुरक्षा मिलती, गाइड को सही दाम मिलता और जंगलों पर बढ़ता कमर्शियल दबाव कम होता👉तब तो इस जलसे की कोई तासीर मानी जाती। वरना हजूर, अगर जंगल सिर्फ एक बैकड्रॉप बनकर रह जाए, हाथ में लग्जरी वाइन की चुस्की हो, सामने रिसॉर्ट का लॉन हो और हाथ में साहित्य की किताब👉 फिर देश को साफ-साफ बता देना चाहिए कि यह ‘कॉर्बेट का लिटरेचर फेस्टिवल’ नहीं, बल्कि ‘कॉर्बेट टूरिज्म का नया साहित्यिक पैकेज’ है!
हजूर👉 कॉर्बेट की असली दास्तान तब लिखी जाएगी जब किताब के पन्ने पर बाघ की दहाड़ के साथ-साथ इंसान की लाचारी भी दर्ज होगी, जब रिसॉर्ट के लग्जरी के साथ जंगल के अस्तित्व का सवाल भी छपेगा। वरना एसी कमरों की खिड़की से जंगल तो हर किसी को खूबसूरत ही दिखता है हजूर👉असली जंगल तो वही जानता है जो रात के अंधेरे में उसकी धड़कन के साथ अपनी जान हथेली पर रखकर जीता है!



