जंगल जासूस 👉
हजूर 👉तबादला या खेल? जब साहबों की कुर्सियाँ हिलने पर सीधे हाईकोर्ट ने माँगा 12 साल का हिसाब!
हजूर 👉 उत्तराखंड के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों भूचाल आया हुआ है, क्योंकि राज्य की पूरी अफसरशाही यानी आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के तबादलों व तैनातियों का खेल अब नैनीताल हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग और उनकी संपत्तियों के ब्योरे को लेकर दायर जनहित याचिका पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और उत्तराखंड राज्य सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि पिछले 12 सालों से राज्य में ऑल इंडिया सर्विसेज के अफसरों की कुर्सियों का फेरबदल सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों और कैडर नियमों को दरकिनार करके मनमाने ढंग से किया जा रहा है। इतना ही नहीं, अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति के ब्योरे की जांच महज खानापूरी बनकर रह गई है और अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 के नियमों का कोई असर धरातल पर नहीं दिख रहा है, जिसकी अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होनी तय हुई है।
हजूर 👉 इस पूरे प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलने वाली जनहित याचिका नागरिक संगठन नागरिक मंच से जुड़े बागेश्वर के निडर सामाजिक कार्यकर्ता पंकज पांडे ने दाखिल की है, जो इससे पहले सरयू नदी के संरक्षण जैसे ज्वलंत मुद्दों को भी अदालत तक ले जा चुके हैं। याचिका का सबसे मजबूत आधार सुप्रीम कोर्ट का 31 अक्टूबर 2013 का टीएसआर सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ का वह ऐतिहासिक फैसला है, जिसमें अदालत ने राजनीतिक दखलअंदाजी को खत्म करने के लिए सिविल सेवा बोर्ड बनाने और अधिकारियों का कम से कम दो साल का न्यूनतम कार्यकाल तय करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद केंद्र के डीओपीटी ने 28 जनवरी 2014 को बाकायदा आईएएस, आईपीएस और आईएफएस कैडर नियमों में संशोधन भी किया था। मगर आरटीआई से हासिल दस्तावेजों के आधार पर याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उत्तराखंड में वर्ष 2014 में बोर्ड का गठन होने के बावजूद सैकड़ों तबादलों में इस बोर्ड की कोई भूमिका ही नहीं रहने दी गई।
हजूर 👉 याचिका में खुलासा किया गया है कि राज्य में कई ताकतवर अफसरों के तबादले केवल मौखिक निर्देशों के आधार पर कर दिए गए और बाद में मुख्यमंत्री से कार्योत्तर अनुमोदन लेकर लीपापोती की गई, जबकि दो साल का न्यूनतम कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाए गए अधिकारियों की निर्धारित त्रैमासिक रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी ही नहीं गई। आईपीएस अधिकारियों के लिए अगस्त 2018 में बोर्ड गठन के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और पुलिस स्थापना बोर्ड के जरिए मनमाफिक तैनातियां की गईं। आईएफएस यानी वन सेवा के अधिकारियों के मामले में तो और भी बड़ा खेल हुआ, जहां पहले से तय तबादला सूचियों पर बोर्ड के सदस्यों से सिर्फ औपचारिक हस्ताक्षर करवाकर प्रक्रिया पूरी कर ली गई। हद तो तब हो गई जब खुद डीओपीटी ने 16 दिसंबर 2025 को पत्र भेजकर राज्य सरकार से सिविल सेवा बोर्ड की कार्यप्रणाली का हिसाब मांगा, लेकिन सरकार ने उसका भी कोई संतोषजनक जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।
हजूर 👉 याचिका में राज्य के कई विवादित और चर्चित मामलों की मिसाल देकर पूरी व्यवस्था को बेनकाब किया गया है। देहरादून के एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का जिक्र करते हुए सवाल उठाया गया कि वर्ष 2013 में नैनीताल जिले में एक गंभीर आपराधिक मामले में घिरने के बावजूद उन्हें राजधानी की कमान सौंप दी गई। इसी तरह वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों का सामना करने वाले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एस. राजू को कार्रवाई के बजाय महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से नवाजा गया और जुलाई 2020 में ऊधमसिंह नगर के तत्कालीन एसएसपी बरिंदरजीत सिंह ने अपने समय-पूर्व तबादले को प्रताड़ना बताते हुए हाईकोर्ट की शरण ली थी। वन महकमे के बड़े आईएफएस अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा पर करीब दस वर्षों तक अचल संपत्ति का ब्योरा न देने के बावजूद पदोन्नति पाकर वन बल प्रमुख बनने का आरोप है, तो वहीं वर्तमान मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन का नाम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी एनजीटी रिपोर्ट में शामिल रहा है।
हजूर 👉 बार-बार तबादलों की सनक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले बागेश्वर जिले में पिछले चार सालों के भीतर पांच पुलिस अधीक्षक बदल डाले गए, जिससे जिले की कानून-व्यवस्था और विकास कार्य पूरी तरह पटरी से उतर जाते हैं। इसके साथ ही याचिका में अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 के नियम 16 का हवाला देते हुए अफसरों की बेहिसाब संपत्ति की जांच पर भी तीखे सवाल दागे गए हैं, क्योंकि राज्य गठन के बाद से आय से अधिक संपत्ति में सिर्फ एक आईएएस अधिकारी राम विलास यादव पर ही कार्रवाई हो सकी। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई है कि बिना सिविल सेवा बोर्ड की संस्तुति के तबादलों पर रोक लगाई जाए, 28 जनवरी 2014 के बाद के सभी समय-पूर्व तबादलों की समेकित रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए और संपत्ति विवरणों की वार्षिक जांच सुनिश्चित की जाए। फिलहाल दो हफ्ते का समय मिलने के बाद शासन के बड़े-बड़े हुक्मरानों की धड़कनें तेज हैं और तीन हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।



