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हजूर 👉MD नीना ग्रेवाल के नए फरमान से गरमाया वन निगम👉RTI में फूटा करोड़पति ‘मजदूरों’ का घोटाला, विजिलेंस रिपोर्ट दबाए बैठे हैं अफसर!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम में इन दिनों सिर्फ लकड़ियों की कटाई नहीं हो रही, बल्कि करोड़ों के गोलमाल और अफसरों की खींचतान का एक ऐसा शह-मात का खेल चल रहा है जिसने पूरे महकमे को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ प्रबंध निदेशक नीना ग्रेवाल के एक नए फरमान ने पूरे तंत्र में हड़कंप मचा रखा है, तो दूसरी तरफ कागजों पर करोड़पतियों और स्कूली बच्चों से पेड़ कटवाकर सरकारी खजाना लुटाने का सनसनीखेज सच सामने आया है। नियमों का हवाला देकर अपनों को बचाने और जंगलों को निजी ठेकेदारों के हवाले करने की इस पूरी कहानी ने निगम के काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया है।
हजूर 👉 कहानी की शुरुआत होती है प्रबंध निदेशक नीना ग्रेवाल के उस चार सूत्रीय दिशा-निर्देश वाले पत्र से, जिसने अफसरों की रातों की नींद उड़ा दी है। आदेश में साफ कहा गया है कि पेड़ों की कटाई से लेकर लकड़ी के ढुलान तक का पाई-पाई का काम अब टेंडर और तय दरों पर ही होगा। प्रबंध निदेशक ने तो इसे पारदर्शिता का नाम दिया, लेकिन मैदानी अफसरों के पसीने छूट गए। जीएम कुमाऊं तेजस्वनी पाटिल ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए प्रबंध निदेशक को पत्र भेजा और साफ तौर पर आगाह किया कि अगर जंगलों में निजी ठेकेदारों की सीधी एंट्री हुई तो अवैध कटान का वो दौर शुरू होगा जिसे संभालना नामुमकिन हो जाएगा। उधर जीएम गढ़वाल धीरज पांडे ने भी स्पष्ट कर दिया कि जंगलों में जमीनी हालात हमेशा एक जैसे नहीं होते। आपात स्थिति आने पर तय दरों के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा जा सकता, संवेदनशील मौकों पर काम कराने के लिए तुरंत बजट बढ़ाना ही पड़ता है। इस नीतिगत जंग ने महकमे को दो फाड़ कर दिया है।
हजूर 👉 लेकिन असली तड़का तो उस विजिलेंस जांच ने लगाया है जिसने निगम के बड़े साहिबों के होश उड़ा दिए हैं। सूत्रों की मानें तो पेड़ कटान की आड़ में एक ऐसा सिंडिकेट चल रहा था जिसने फर्जीवाड़े की सारी हदें पार कर दीं। कागजों में पेड़ काटने वाले दिहाड़ी मजदूर कोई आम गरीब नहीं, बल्कि शहर के करोड़पति, वन निगम के कर्मचारियों के सगे परिजन, नामचीन बुजुर्ग और यहां तक कि स्कूल में बस्ता लेकर जाने वाले छोटे-छोटे बच्चे दिखाए गए। अफसरशाही की मेहरबानी देखिए, इन फर्जी मजदूरों के खातों में लाखों-करोड़ों की रकम पानी की तरह बहाई गई। मजे की बात यह है कि जो कागजों में मजदूर बनकर दर्ज थे, वही पर्दे के पीछे असली ठेकेदार बनकर पूरी मलाई काट रहे थे।
हजूर 👉 जब इस महाघोटाले की भनक लगी तो उत्तराखंड विजिलेंस ने चुपचाप जाल बिछाया, जांच पूरी की और पक्के सबूतों के साथ अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी। लगा था कि अब भ्रष्टों पर गाज गिरेगी, लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। शासन ने जांच का जिम्मा प्रबंध निदेशक उत्तराखंड वन विकास निगम को सौंपा, प्रबंध निदेशक ने इसे महाप्रबंधक कुमाऊं को आगे बढ़ाया, और महाप्रबंधक कुमाऊं ने आखिरकार जांच की यह जिम्मेदारी क्षेत्रीय प्रबंधक कुमाऊं (हल्द्वानी) के आईएफएस अधिकारी मयंक शंकर झा की झोली में डाल दी। फिर क्या था, अफसरशाही की इस लंबी सीढ़ी से गुजरकर विजिलेंस की रिपोर्ट जैसे ही जांच अधिकारी के पास पहुंची, फाइल पर ऐसी धूल जमनी शुरू हुई कि कई महीने बीत गए लेकिन साहिब की जांच पूरी होने का नाम ही नहीं ले रही।
हजूर 👉 जब सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत सवाल दागे गए तो इस पूरे ठंडे बस्ते का भयंकर भांडा फूटा। एक तरफ विजिलेंस की पक्की रिपोर्ट और दूसरी तरफ कई महीनों से रेंगती हुई विभागीय जांच। अब गलियारों में यह चर्चा चरम पर है कि क्या आईएफएस अधिकारी मयंक शंकर झा की यह सुस्त चाल महकमे के उन मगरमच्छों और भ्रष्ट सिंडिकेट को बचाने का पक्का इंतजाम है जिन्होंने सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाया है। नीतियों की जंग, ठेकेदारी का विरोध और घोटालों पर पर्दा डालने की इस आंधी में वन विकास निगम का पूरा तंत्र बेनकाब हो चुका है।



