हजूर 👉 वन्यजीव सप्ताह में मंच पर तालियां, जंगल की मेड़ पर मातम! 2 साल में 152 मौतें… फिर भी कहानी सिर्फ बाघ की क्यों

 

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 वन्यजीव सप्ताह में मंच पर तालियां, जंगल की मेड़ पर मातम! 2 साल में 152 मौतें… फिर भी कहानी सिर्फ बाघ की क्यों?

हजूर 👉 देवभूमि में 2 से 8 अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह शुरू होते ही देहरादून से कॉर्बेट, रामनगर, हल्द्वानी और चमोली तक माहौल ऐसा हो जाता है जैसे पूरा प्रदेश अचानक जंगल का ब्रांड एंबेसडर बन गया हो। कहीं गोष्ठी, कहीं जागरूकता रैली, कहीं संरक्षण का संदेश और कहीं बाघ-हाथी के साथ सह-अस्तित्व की शानदार बातें। मंच पर माइक गरम, कैमरे चालू और तालियां तैयार! मगर इसी चमकदार तस्वीर के पीछे जंगल की मेड़ पर एक दूसरी फिल्म भी चल रही है👉जहां ग्रामीण को यह पता नहीं होता कि खेत से लौटते समय रास्ते में पड़ोसी मिलेगा या गुलदार, हाथी अथवा भालू। मंच पर वन्यजीव सप्ताह है, जंगल के किनारे रहने वाले आदमी के लिए रोज ‘सरप्राइज टेस्ट’ है।

हजूर 👉 अब आते हैं उस आंकड़े पर जो किसी गोष्ठी के मंच से ज्यादा जोर से बोलता है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 2024 में 84 और 2025 में 68 लोगों की मानव-वन्यजीव संघर्ष में जान गई👉यानी दो साल में 152 मौतें। नैनीताल की लीला देवी, शांति देवी, हेमा देवी और रेखा देवी, रामनगर के प्रेम सिंह, भुवन चंद्र बेलवाल और विनोद कुमार तथा चंपावत के भंवर राम और देव सिंह अधिकारी जैसे नाम इस आंकड़े में दर्ज हैं। कागज पर 152 एक संख्या है, लेकिन जिन घरों में ये लोग लौटकर नहीं आए, वहां शायद कैलेंडर आज भी उसी तारीख पर अटका होगा। वन्यजीव सप्ताह में अगर बाघ की गिनती हो रही है तो इन 152 जिंदगियों का हिसाब भी उसी कहानी का हिस्सा है👉आखिर जंगल की खबर सिर्फ जंगल के जानवरों से तो नहीं बनती!

हजूर 👉 दूसरी तरफ कॉर्बेट और आसपास का पर्यटन देखिए👉सफारी की बुकिंग, जंगल घूमने का रोमांच और बाघ की एक झलक के लिए पर्यटकों की आंखें दूरबीन बनी रहती हैं। वन्यजीवों की शांति के लिए मोबाइल फोन से जुड़े नियमों तक का पालन कराया जाता है। पर्यटक कुछ घंटों के लिए जंगल में आता है, बाघ दिख जाए तो फोटो, न दिखे तो अगली सफारी। लेकिन जंगल की सीमा पर रहने वाले ग्रामीण की ‘सफारी’ रोज की है👉हाथी खेत में आ गया तो फसल की सफारी, गुलदार रास्ते में मिल गया तो सांसों की सफारी और भालू झाड़ियों से निकल आया तो कहानी सीधे ब्रेकिंग न्यूज! हरिद्वार की ‘पड़ोसी हाथी’ जैसी पहल और हल्द्वानी-तराई के जागरूकता कार्यक्रम अपनी जगह हैं, लेकिन गांव की रात का असली हाल वही जानता है जो अंधेरे में घर से बाहर निकलता है।

हजूर 👉 अब वन्यजीव संरक्षण की कहानी का एक और ‘ट्विस्ट’ देखिए। कहीं बाघ या गुलदार की खाल, हड्डियां अथवा दूसरे अंग बरामद होते हैं तो तस्कर या कूरियर पकड़ा जाता है और खबर की गाड़ी गिरफ्तारी पर ब्रेक लगा देती है। लेकिन वन्यजीव प्रेमियों का सवाल यहीं से शुरू होता है👉भाई, खाल आई कहां से? जानवर मरा कहां? किस बीट में शिकार हुआ? घटना कितने दिन पुरानी है? असली क्राइम सीन कौन-सा जंगल है? अगर इन सवालों की तलाश पीछे तक नहीं जाती तो कूरियर तो पकड़ में आ गया, लेकिन कूरियर से पहले कौन था और जंगल में आरी/बंदूक किसके हाथ थी👉यह कहानी पर्दे के पीछे ही रह जाती है। वन्यजीव अंग बरामद होना आखिरी सिरा है; असली कहानी उस जगह छिपी है जहां से वह माल निकला।

हजूर 👉 तो वन्यजीव सप्ताह की तस्वीर कुछ यूं बनती है👉देहरादून में मंच सजा है, कॉर्बेट में सफारी चल रही है, गांव की पगडंडी पर डर चल रहा है और तस्करी की फाइल में कुछ अनसुलझे सवाल घूम रहे हैं। एक तरफ बाघ को बचाने की तालियां हैं, दूसरी तरफ मानव-वन्यजीव संघर्ष में दो साल में 152 मौतों का आंकड़ा है। और तीसरी तरफ बरामद खालें पूछ रही हैं कि जंगल में शिकार हुआ कहां था। अब जंगल जासूस के पास भी एक ही सवाल हैं 👉वन्यजीव सप्ताह में आखिर कहानी सिर्फ उस जानवर की होगी जिसे कैमरे में दिखाया जा सकता है, या उस इंसान की भी होगी जो जंगल के किनारे रहते हुए रोज कैमरे के बाहर जिंदगी जी रहा है? यही सवाल इस बार वन्यजीव सप्ताह के मंच से थोड़ा बाहर निकलकर जंगल की पगडंडी तक जाना चाहता है।

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