जंगल जासूस👉
हजूर 👉55 दिन में कुर्सी का खेल खत्म! दीपक कुमार गए, राहुल मिश्रा आए, हजूर इस तबादला एक्सप्रेस की चेन किसने खींची?
हजूर👉 वन विभाग में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं, जंगल वहीं है, फाइलें भी वहीं रखी हैं, लेकिन साहबों की कुर्सियों पर ऐसा मौसम बदला कि अच्छे-अच्छे प्रशासनिक कैलेंडर भी चक्कर खा जाएं! तराई पूर्वी वन प्रभाग, हल्द्वानी में दीपक कुमार ने जिम्मेदारी संभाली और करीब 55 दिन के भीतर तबादले का फरमान सामने आ गया। अभी तो नई कुर्सी के हत्थों पर हाथ जमना था, अभी तो दफ्तर के बाबुओं को साहब के काम करने का अंदाज समझना था, अभी तो रेंजों की फाइलों से परिचय होना था, मगर हजूर, कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि कुर्सी पर बैठे अधिकारी को ही अपनी अगली मंजिल का पता आदेश आने पर चला! सवाल सीधा है👉क्या 55 दिन किसी अधिकारी की कार्यशैली का पूरा हिसाब लगाने के लिए पर्याप्त थे, या इस छोटे से कार्यकाल के पीछे कोई ऐसी प्रशासनिक वजह थी जिसे शासन को स्पष्ट करना चाहिए? आखिर तबादला हुआ तो हुआ क्यों, और इतनी जल्दी क्यों?
हजूर👉 अब आते हैं उस चर्चा पर जिसने विभागीय गलियारों में कान खड़े कर रखे हैं। चर्चा है कि एक जनप्रतिनिधि के सामने नियम-कायदों की बात रखने का घटनाक्रम दीपक कुमार के तबादले से जोड़कर देखा जा रहा है। मगर ध्यान रहे, चर्चा और प्रमाण में उतना ही फर्क है जितना जंगल में उठते धुएं और आग की पुष्टि में होता है। अभी इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं है। फिर भी सवाल पूछने से परहेज क्यों हो? यदि जनप्रतिनिधि से जुड़ी चर्चा निराधार है, तो शासन के पास तबादले का प्रशासनिक आधार स्पष्ट करने का रास्ता खुला है। और यदि फैसला किसी दूसरी प्रशासनिक जरूरत के कारण हुआ, तो वह जरूरत क्या थी? हजूर, नियमों की किताब का भी बड़ा अजीब इम्तिहान है👉कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सबको नियम मानने हैं, मगर जनता यह जानना चाहे कि फैसले किन नियमों और कारणों पर हुए, तो जवाब की फाइल कहां अटक जाती है? कुर्सी बदलने का आदेश सार्वजनिक हो सकता है, तो उसके पीछे का प्रशासनिक तर्क भी सवालों से परे क्यों रहे?
हजूर👉इस कहानी का दूसरा दृश्य और भी तेजी से बदला। दीपक कुमार की जगह राहुल मिश्रा को तराई पूर्वी वन प्रभाग की कमान सौंप दी गई। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक रहे राहुल मिश्रा ने, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, आदेश वाले दिन ही नई जिम्मेदारी संभाल ली। सुबह आदेश, उसी दिन कार्यभार👉वाह हजूर, जब प्रशासनिक पहिया घूमता है तो रफ्तार भी गजब की निकलती है! मगर यही तेजी एक और सवाल छोड़ती है। जब एक अधिकारी को उसी दिन नई कुर्सी पर बैठाया जा सकता है, तो तबादलों के बाद कार्यमुक्ति और नई तैनाती को लेकर दूसरे मामलों में देरी क्यों होती है? यहां राहुल मिश्रा की नियुक्ति पर उंगली उठाना मकसद नहीं, बल्कि व्यवस्था से एक सीधा सवाल है👉क्या तबादलों के लिए कोई स्पष्ट, समान और पारदर्शी प्रक्रिया है, या हर मामले की घड़ी अलग-अलग चलती है? वन विभाग में कुर्सी के साथ सिर्फ नामपट्ट नहीं बदलता, जिम्मेदारी भी बदलती है। ऐसे में फैसलों की रफ्तार के साथ उनके कारणों की स्पष्टता भी जरूरी है।
हजूर👉इसी तबादला कहानी में आदित्य रत्न का नाम भी आता है। पिथौरागढ़ से हल्द्वानी वन प्रभाग में तैनात किए गए आदित्य रत्न को भी करीब 55 दिन के आसपास दूसरी जिम्मेदारी दी गई, हालांकि उपलब्ध आदेश में उनके मामले में पारिवारिक परिस्थितियों का उल्लेख है। लिहाजा दोनों मामलों को एक ही चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा। लेकिन छोटे कार्यकालों की यह तस्वीर विभागीय स्थिरता पर सवाल जरूर उठाती है। अधिकारी नई जगह पहुंचता है, इलाके को समझता है, अधीनस्थ कर्मचारियों से तालमेल बनाता है, लंबित फाइलें खोलता है और कामकाज की दिशा तय करता है👉तभी तैनाती बदल जाती है। हजूर, जंगल में न तो वन्यजीव तबादला आदेश पढ़कर अपनी चाल बदलते हैं, न वन अपराधी नए डीएफओ के स्वागत में छुट्टी पर जाते हैं। फिर प्रशासनिक बदलावों में निरंतरता और कामकाज की समीक्षा का हिसाब कौन रखेगा? अगर तबादला जरूरी था, तो उसका आधार सामने आना चाहिए; और अगर चर्चा के पीछे कोई तथ्य नहीं है, तो उसे भी साफ किया जाना चाहिए। चुप्पी में अफवाहों की उम्र लंबी होती है, तथ्यों में नहीं।
हजूर 👉अब गेंद शासन के पाले में है। दीपक कुमार का तबादला किन कारणों से हुआ, राहुल मिश्रा को उसी दिन प्रभार सौंपने की जरूरत क्यों पड़ी और करीब 55 दिन के भीतर हुए इस फेरबदल के पीछे कौन-सा प्रशासनिक आकलन था👉इन सवालों का जवाब अनुमान नहीं, रिकॉर्ड दे सकता है। जनप्रतिनिधि से जुड़ी चर्चा की पुष्टि हुए बिना किसी को दोषी ठहराना गलत होगा, लेकिन चर्चा के बहाने असली प्रशासनिक सवालों को दबा देना भी ठीक नहीं। आखिर जनता यह जानना चाहती है कि तबादला नीति में स्थिरता कितनी है, फैसलों में पारदर्शिता कितनी है और जवाबदेही किसकी है। हजूर, कुर्सी पर बैठने वाले बदलते रहेंगे, नामपट्ट उतरते-चढ़ते रहेंगे, आदेश आते-जाते रहेंगे👉मगर 55 दिन की इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है हजूर 👉दीपक कुमार की कुर्सी बदली, राहुल मिश्रा ने कमान संभाली, लेकिन इस पूरे फेरबदल का स्पष्ट प्रशासनिक हिसाब कौन देगा?



