हजूर 👉 रेड कारपेट पर ‘वन्यजीव सप्ताह’ का जश्न, जंगल में अनुत्तरित सवाल👉 दरांती से घायल हुआ गुलदार आखिर गया कहाँ?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 रेड कारपेट पर ‘वन्यजीव सप्ताह’ का जश्न, जंगल में अनुत्तरित सवाल👉 दरांती से घायल हुआ गुलदार आखिर गया कहाँ?

हजूर 👉 देहरादून के ऑडिटोरियम में वन्यजीव सप्ताह के भव्य मंच सज चुके हैं। अधिकारियों के गले में मालाएं हैं, मंच से मानव और वन्यजीव के सह-अस्तित्व की चाशनी में डूबी बातें परोसी जा रही हैं और रेड कारपेट पर करोड़ों के बजट वाले वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट का रिपोर्ट कार्ड लहराया जा रहा है। मगर इस चमचमाती दुनिया से दूर पहाड़ की दुर्गम पगडंडियों पर कहानी बिल्कुल अलग है। दर्शानी और पाटली की घनी झाड़ियों से उठे तीखे सवाल आज भी हवा में तैर रहे हैं, जिनका जवाब किसी मुख्य वन संरक्षक के भाषण के पास नहीं है। सवाल सीधा है कि जब बागेश्वर के दर्शानी में गीता देवी ने अपनी गर्दन को गुलदार के जबड़ों से छुड़ाने के लिए लोहे की धारदार दरांती से ताबड़तोड़ पलटवार किया, और जब पाटली की प्रेमा जोशी तथा हेमा जोशी ने अपनी जान बचाने के लिए वही धारदार दरांती उठाई, तो उसके बाद उन गुलदारों का क्या हुआ। क्या दरांती के तीखे प्रहार से लहुलुहान हुआ वह जानवर जंगल की गहराइयों में तड़प रहा है, या फिर जख्म का दर्द उसे और अधिक आक्रामक बनाकर किसी दूसरी निहत्थी महिला पर झपटने के लिए तैयार कर रहा है।

हजूर 👉 दर्शानी गांव की घटना कोई सामान्य खबर नहीं थी। घास काट रही महिला पर जब गुलदार ने जानलेवा हमला बोला तो मौत सामने खड़ी थी। महिला ने अपनी पूरी ताकत से दरांती चलाई और गुलदार को भागना पड़ा। घटना के तुरंत बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, एक लोहे का पिंजरा वहां पटक दिया गया, कुछ कर्मचारी गश्त के नाम पर टहलते दिखे और फिर फाइलों में दर्ज कर दिया गया कि स्थिति नियंत्रण में है। लेकिन यहीं से जंगल जासूस का असली पड़ताल शुरू होता है। जब किसी वन्यजीव पर लोहे के हथियार से प्रहार होता है तो पशु विज्ञान के साधारण नियम कहते हैं कि जानवर जख्मी हुआ होगा। विभाग ने गांव के मुहाने पर पिंजरा तो टांग दिया, लेकिन आधिकारिक दस्तावेजों में इस बात का कोई साफ ब्योरा क्यों नहीं है कि उस पिंजरे में जो गुलदार फंसा या जो आसपास देखा गया, क्या वही दरांती का शिकार हुआ जानवर था। क्या घटनास्थल से खून के नमूने उठाए गए, क्या पदचिह्नों की नापजोख हुई और क्या किसी पशु चिकित्साधिकारी ने मौके पर जाकर यह प्रमाणित किया कि वह वन्यजीव घायल है या स्वस्थ।

हजूर 👉 पाटली की कहानी तो और भी दिलचस्प है। जिन दो महिलाओं ने दरांती के दम पर गुलदार को खदेड़ा, उन्हें वन्यजीव सप्ताह के लाल कालीन पर मुख्यमंत्री के हाथों सम्मान दिला दिया गया। सरकार ने अपनी पीठ थपथपा ली और विभाग ने दावा कर दिया कि क्षेत्र में ड्रोन उड़ाए गए हैं और चप्पे-चप्पे पर कैमरा ट्रैप लगा दिए गए हैं। मगर इस पूरी चमक-धमक के पीछे से एक बेहद चुभता हुआ सवाल झांक रहा है। जिन कैमरों और ड्रोन की तस्वीरों का ढोल पीटा जा रहा है, क्या उनकी फुटेज में उस दरांती खाए गुलदार की शारीरिक स्थिति दर्ज हो सकी। अगर वह गुलदार घायल था तो क्या उसे पकड़कर उसका इलाज करने के लिए कोई विशेष रेस्क्यू टीम जंगल में उतारी गई, और अगर वह घायल नहीं था तो विभाग ने किस वैज्ञानिक आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि दरांती का वार खाली गया था। सबसे बड़ा खतरा तो यह है कि अगर वह जख्मी जानवर डर के मारे उस इलाके को छोड़कर किसी दूसरे गांव या बस्ती की तरफ रुख कर गया है, तो क्या उस नए इलाके के ग्रामीणों को कोई चेतावनी जारी की गई।

हजूर 👉 पौड़ी के नैनीडांडा में मंजू देवी की भालू के हमले में हुई दर्दनाक मौत यह याद दिलाने के लिए काफी है कि पहाड़ में कागजी मुस्तैदी और धरातल की सच्चाई के बीच कितना बड़ा फासला है। एक तरफ कैम्पा और सुरक्षा मदों के करोड़ों रुपये फाइलों में खर्च हो जाते हैं, सोलर फेंसिंग के नाम पर बजट का बंटवारा हो जाता है और एनजीओ के साथ मिलकर जागरूकता की बैठकों के बिल पास हो जाते हैं। दूसरी तरफ पहाड़ की बेबस महिलाएं रोज अपनी जान हथेली पर रखकर जंगल जाने को मजबूर हैं। वन्यजीव प्रबंधन का राष्ट्रीय प्रोटोकॉल साफ कहता है कि जब भी किसी संघर्ष में किसी जानवर के घायल होने की संभावना हो, तो उसे तुरंत चिह्नित कर उसका मेडिकल असेसमेंट किया जाना चाहिए और उसकी लोकेशन ट्रेस की जानी चाहिए। क्योंकि एक घायल और दर्द से तड़पता हिंसक जानवर प्राकृतिक शिकार करने में असमर्थ हो जाता है और वह आसान शिकार यानी इंसानों पर बार-बार हमला करता है।

हजूर 👉 पिंजरा लगा देना और गश्त का दावा कर देना महज़ एक प्रशासनिक औपचारिकता हो सकती है, लेकिन जन-सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद आधा-अधूर कदम है। जनता को अब अधिकारियों की गोल-मोल बातों से आगे बढ़कर ठोस आंकड़े चाहिए। संबंधित वन प्रभागों को यह सार्वजनिक करना पड़ेगा कि दर्शानी और पाटली की घटनाओं के बाद वास्तव में कितने कैमरा ट्रैप क्रियाशील थे, ड्रोन कैमरों ने जंगल की कितनी झाड़ियों को खंगाला, क्या किसी डॉक्टर ने उस वन्यजीव की स्थिति पर कोई लिखित रिपोर्ट तैयार की और क्या पिंजरे के सामने दर्ज मस्टर रोल में इस बात की पुष्टि है कि पकड़ा गया जानवर वही था। जब तक इन सवालों के जवाब कैमरे की बंद आंख और बंद फाइलों से बाहर निकलकर दस्तावेजों के रूप में सामने नहीं आते, तब तक रेड कारपेट पर मनाए जाने वाले इस वन्यजीव सप्ताह को जंगल की ज़मीन पर फैला एक बड़ा छलावा ही माना जाएगा।

 

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