जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 वन्यजीव सप्ताह के ढोल के बीच पिथौरागढ़ में खूनी कहर👉हजूर 👉 दादी की आंखों के सामने 10 साल के रियांशु को उठा ले गया गुलदार, पहले चेतावनी फिर भी क्यों नहीं जागा सिस्टम?
हजूर 👉 उत्तराखंड में वन्यजीव सप्ताह का ढोल बज रहा है। मंचों पर वन्यजीव संरक्षण के संदेश गूंज रहे हैं, इंसान और वन्यजीव के बीच सहअस्तित्व की बातें हो रही हैं, लेकिन इसी बीच पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से आई एक खबर ने पहाड़ की जमीनी हकीकत सामने पटक दी है। भंडारीगांव और खेतीगांव के बीच शनिवार शाम करीब पांच बजे दस साल का रियांशु अपने घर के आंगन में दादी के सामने खेल रहा था। अचानक गुलदार ने हमला किया और मासूम को उठा ले गया। देखते ही देखते घर में चीख-पुकार मच गई। तलाश शुरू हुई तो घर से करीब 200 मीटर दूर झाड़ियों में बच्चे का शव मिला। जिस आंगन में कुछ पल पहले मासूम की आवाज गूंज रही थी, वहीं अब मातम पसरा था।
हजूर 👉 रियांशु के पिता भगवान राम मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। दस साल के बच्चे की मौत ने परिवार को तोड़कर रख दिया है। घटना के बाद ग्रामीणों और परिजनों ने आसपास तलाश शुरू की। वन विभाग की टीम वन दरोगा देवेंद्र सिंह महरा के नेतृत्व में मौके पर पहुंची। टीम में अजय पल्याल, मनीषा, लक्ष्मी लुंठी और दीवान सिंह शामिल रहे। पुलिस टीम भी मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई शुरू की। एसआई आकिल सिद्दीकी के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों ने घटनास्थल पर स्थिति संभाली। शव को गंगोलीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां पोस्टमार्टम की कार्रवाई होनी थी।
हजूर 👉 लेकिन असली कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि यहीं से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। ग्रामीणों के अनुसार इलाके में गुलदार की सक्रियता पहले से थी। बताया गया है कि घटना से करीब एक सप्ताह पहले ग्राम प्रधान ने जिलाधिकारी को पत्र भेजकर गांव में गुलदार के आतंक की जानकारी दी थी और कार्रवाई की मांग की थी। यानी खतरे की सूचना पहले ही सरकारी दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। अब सवाल यह है कि उस सूचना के बाद क्या हुआ? क्या इलाके में गश्त बढ़ी? क्या निगरानी की गई? क्या कैमरा ट्रैप लगाए गए? क्या ग्रामीणों को सतर्क किया गया? क्या गुलदार को पकड़ने के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई शुरू हुई? अगर खतरे की घंटी पहले ही बज चुकी थी तो रियांशु की मौत के बाद ही व्यवस्था क्यों जागी, यह सवाल अब ग्रामीणों की जुबान पर है।
हजूर 👉 सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि यह हादसा ऐसे वक्त हुआ है जब पूरे उत्तराखंड में वन्यजीव सप्ताह मनाया जा रहा है। एक तरफ वन्यजीवों के संरक्षण के संकल्प लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ पहाड़ के एक गांव में एक परिवार अपने दस साल के बच्चे को खो चुका है। वन्यजीवों को बचाना जरूरी है, लेकिन जंगल और गांव की सीमा पर रहने वाले इंसानों की सुरक्षा भी उसी व्यवस्था की जिम्मेदारी है। सहअस्तित्व का मतलब यह नहीं कि ग्रामीण अपने ही घर के आंगन में बच्चों को खेलने से डरें और हर झाड़ी के पीछे खतरा तलाशें।
हजूर 👉 ग्रामीणों का गुस्सा इसलिए भी उबल रहा है क्योंकि उनके मुताबिक गुलदार की मौजूदगी कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं थी। अगर किसी गांव से पहले ही खतरे की सूचना प्रशासन को दी गई थी तो उस सूचना की गंभीरता से पड़ताल और समय रहते आवश्यक कदम उठाना जरूरी था। अब घटना के बाद पिंजरा लगाने, गश्त बढ़ाने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग उठ रही है। पीड़ित परिवार को नियमानुसार सहायता और मुआवजा देने की मांग भी सामने है। लेकिन सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं है। सवाल यह है कि अगला रियांशु कौन होगा और क्या अगली घटना से पहले व्यवस्था जागेगी?
हजूर 👉 वन्यजीव सप्ताह की असली परीक्षा बड़े मंचों, भाषणों और कार्यक्रमों में नहीं बल्कि ऐसे गांवों में होती है जहां जंगल इंसान के घर की चौखट से शुरू होता है। रियांशु अब वापस नहीं आएगा। उसकी दादी की आंखों के सामने घटा वह मंजर भी शायद जिंदगी भर नहीं मिटेगा। लेकिन उसकी मौत एक सवाल छोड़ गई है जिसे टाला नहीं जा सकता। वन्यजीव संरक्षण की तस्वीर तभी पूरी होगी जब जंगल का वन्यजीव भी सुरक्षित रहे और जंगल के किनारे रहने वाला इंसान भी। वरना वन्यजीव सप्ताह आता रहेगा, भाषण होते रहेंगे, संकल्प दोहराए जाएंगे और पहाड़ के गांव फिर पूछेंगे कि संरक्षण की इस कहानी में इंसानी जिंदगी की सुरक्षा आखिर किस पन्ने पर लिखी है।



