जंगल जासूस 👉
हजूर 👉जिस्म पर कंक्रीट का लिबास और जंगलों में घुसपैठ👉2,221 दफा बस्तियों में क्यों बजा ख़ौफ़ का सायरन?
हजूर 👉 जरा गौर फरमाइए👉 क्या यह कोई साधारण वन्यजीव रिपोर्ट है या इंसानी बस्तियों पर जंगलात के बेजुबानों का बोला गया कोई खुला धावा? आंकड़ों की बही-खाता खोलकर देखें तो आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि इस बार बात सिर्फ दो-चार भटके हुए जानवरों की नहीं, बल्कि पूरे के पूरे जंगल के इंसानी इलाकों में शिफ्ट हो जाने की है। जहां कभी मुसाफिरों की चहल-पहल हुआ करती थी, वहां आज कोबरा साहब बाकायदा फन फैलाकर दरबार सजाए बैठे हैं। कहीं अजगर महाराज सहूलियत के हिसाब से कुंडली मारे आराम फरमा रहे हैं, तो कहीं पानी से निकलकर मगरमच्छ साहब सड़कों पर ऐसे टहल रहे हैं मानो नगर निगम से इजाजत लेकर शाम की सैर पर निकले हों। 1 जनवरी से लेकर 24 सितंबर के इन महीनों में 2,221 वन्यजीवों को इंसानों के बेडरूम, रसोई और गलियों से घसीटकर बाहर निकालना पड़ा है। यानी रोज औसतन पांच से छह बेबुलाए मेहमानों की बस्तियों में दस्तक। अब इसे जंगल का अतिक्रमण कहें या इंसानों के बनाए कंक्रीट के जंगलों का असर?
हजूर 👉 आंकड़ों की गणित में उतरें तो हरिद्वार रेंज ने तो रिकॉर्ड तोड़ते हुए पहला पायदान हासिल किया है, जहां अकेले 1,145 जीवों की घुसपैठ दर्ज हुई। इसके बाद लक्सर में 359, चिड़ियापुर में 297, खानपुर में 165, रुड़की में 152 और श्यामपुर में 103 मामले दर्ज हुए। मानसून की बारिश में आसमान से सिर्फ पानी की बूंदें नहीं टपकीं, बल्कि वन विभाग के कंट्रोल रूम में बेलगाम बजती फोन की घंटियां और दहशत से कांपती आवाजें भी खूब बरसीं। सबसे ज्यादा दबदबा तो 370 फनधारी कोबरा और 212 विशालकाय अजगरों का रहा, जिन्होंने सैकड़ों परिवारों की सांसें हलक में अटका दीं। रेंगने वाले कातिलों से लेकर खूंखार शिकारियों तक, हर किसी ने इंसानी आबादी की तरफ रुख करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी।
हजूर 👉 बहादराबाद की वह काली रात कौन भूल सकता है? जब एक भारी-भरकम मगरमच्छ इंसानी बस्ती के बीच टहलता हुआ पाया गया। चारों तरफ चीख-पुकार, बंद दरवाजे और छतों पर चढ़े सहमे हुए लोग। गनीमत रही कि जांबाज टीम ने ऐन मौके पर बाजी संभाली और उसे गंगा नदी की शरण में वापस भेजा। लगभग 50 मगरमच्छ और 2 खूंखार गुलदार👉सूची यहीं खत्म नहीं होती, सांभर, नीलगाय और मॉनिटर लिजार्ड तक इंसानी बस्तियों का जायजा लेने पहुंच गए। यानी मामला अब सिर्फ रेंगने वाले जीवों तक नहीं सिमटा, जंगल का पूरा का पूरा कुनबा ही आबादी की तरफ रुख करता दिख रहा है।
हजूर 👉 असली पेंच तो इस भूगोल और इंसानी फैलाव के तालमेल में छिपा है। एक तरफ राजाजी टाइगर रिजर्व का सघन जंगल, दूसरी तरफ खेत, सड़कें और फैलते कंक्रीट के मकान। जब मानसून में जंगलों के भीतर पानी भरा और स्थितियां बदलीं, तो जानवरों ने बेझिझक इंसानी गलियों का रुख कर लिया। लेकिन तल्ख सवाल यह उठना लाजिमी है कि क्या हर बार महज रेस्क्यू वैन दौड़ा देना ही इस पूरी समस्या का हल है? कब तक इंसानी बस्तियां जंगलों के मुहाने पर कब्जा जमाती रहेंगी और कब तक बेजुबान अपने ही घर में बेघर होकर सड़कों पर भटकते रहेंगे?
हजूर 👉 जान हथेली पर रखकर हर कॉल पर दौड़ने वाले वनकर्मियों का जज्बा वाकई काबिले-तारीफ है। सीमित संसाधन, हाथों में मामूली डंडे और जाली👉और सामने साक्षात काल बनकर खड़ा जहरीला कोबरा या झपट्टा मारने को तैयार गुलदार। जरा सी चूक और जिंदगी का खेल खत्म। मानसून से पहले दी गई ट्रेनिंग और क्विक रिस्पांस टीमों की चुस्ती ने हजारों जानें तो बचा लीं, पर रेंज अधिकारी शीशपाल सिंह की यह अपील बिल्कुल जायज है कि वन्यजीव को देखते ही खुद पकड़ने या परेशान करने की भूल न करें। कोबरा साहब को कैमरे का फ्लैश पसंद नहीं और मगरमच्छ साहब किसी की मेहमाननवाजी स्वीकार करने नहीं आते। लेकिन 2,221 का यह आंकड़ा सिर्फ उपलब्धि का बोर्ड बनाकर टांग देने वाली बात नहीं है, यह आईना है जंगल और आबादी के बीच बढ़ती खींचतान का। जानवर बार-बार इंसानों के घरों में घुसेंगे, वनकर्मी बार-बार उन्हें वापस जंगल में भेजेंगे… पर क्या कभी उन कारणों पर सीधी चोट होगी, जिनकी वजह से जंगल के जीव इंसानों की बस्ती का रास्ता पकड़ रहे हैं?



