जंगल जासूस 👉
हजूर 👉उत्तराखंड वन विभाग में तबादला समीक्षा का बड़ा खेल, दोहरे रवैये से सुलगते सवाल?
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विभाग में 10 जून और 30 जून 2026 को जारी हुए स्थानांतरण आदेशों के बाद से प्रशासनिक गलियारों में एक नया राजनीतिक और नीतिगत घमासान छिड़ गया है। वन मुख्यालय देहरादून में उच्च अधिकारियों की बंद कमरों में हुई बैठकों से यह सुगबुगाहट बाहर आई कि तीन साल की सेवा अवधि पूर्ण न होने और एक साथ बड़ी संख्या में हुए तबादलों को आधार बनाकर समीक्षा की तैयारी की जा रही है। सवाल यह उठता है कि यदि तीन वर्ष की अनिवार्य सेवा का नियम इतना ही ठोस है, तो पिछले एक-दो वर्षों के भीतर महज छह माह या एक साल की सेवा वाले कर्मचारियों को रातों-रात स्थानांतरित और कार्यमुक्त किस आधार पर किया गया था? यदि उस समय प्रशासनिक आवश्यकता, पद की रिक्तता या व्यक्तिगत विषमताओं को ढाल बनाया गया था, तो आज समान परिस्थितियों का सामना कर रहे कर्मचारियों पर अलग मापदंड क्यों थोपे जा रहे हैं?
हजूर 👉 कार्यमुक्ति यानी रिलीविंग की प्रक्रिया ने इस पूरे मामले में दोहरे रवैये की पोल खोलकर रख दी है। एक ही स्थानांतरण आदेश के तहत गोविंद वन्यजीव अभयारण्य से तीन-चार कर्मचारियों और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व जैसे अति-संवेदनशील क्षेत्र से दो कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर दिया गया, जबकि दर्जनों अन्य कर्मचारी आज भी अपनी रिलीविंग के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। यदि गोविंद और कॉर्बेट जैसे संवेदनशील प्रभागों से कर्मचारियों को छोड़ना संभव था, तो अन्य सामान्य प्रभागों में किस ‘विभागीय संवेदनशीलता’ या ‘व्यवस्था’ का हवाला देकर फाइलें रोकी जा रही हैं? जब एक ही विभाग, एक ही स्थानांतरण सत्र और एक ही स्तर के पद हैं, तो किसी के लिए तत्काल रिलीविंग का लाल कालीन और किसी के लिए अनिश्चितता का जाल क्यों बिछाया जा रहा है?
हजूर 👉 भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 साफ तौर पर कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार देता है। यद्यपि स्थानांतरण पूरी तरह से प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का विषय है, लेकिन जब एक ही नीति के तहत अलग-अलग कर्मचारियों के लिए अलग-अलग पैमाने अपनाए जाते हैं, तो प्रक्रिया की निष्पक्षता पर उंगली उठना स्वाभाविक है। प्रभावित कर्मचारी किसी अन्य साथी के स्थानांतरण या कार्यमुक्ति का विरोध नहीं कर रहे हैं; उनकी एकमात्र मांग यह है कि नियम सबके लिए एक समान होने चाहिए। कर्मचारियों ने नए तैनाती स्थल पर जाने के लिए अपनी पूरी तैयारी कर रखी है, लेकिन रिलीविंग अटकाए रखने के कारण उनके पारिवारिक, व्यक्तिगत और बच्चों के दाखिले से जुड़े तमाम कार्य ठप पड़े हैं।
हजूर 👉 अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही है कि जून 2026 में जारी इन स्थानांतरण आदेशों का भविष्य क्या होने वाला है? क्या वन मुख्यालय अपनी बनाई नीति पर टिकते हुए कार्यमुक्ति की एक पारदर्शी और निश्चित समयसीमा घोषित करेगा, या फिर समीक्षा के नाम पर इन आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? यदि विभाग इन आदेशों को निरस्त या स्थगित करता है, तो उसका स्पष्ट, तार्किक और लिखित आधार प्रभावित कर्मचारियों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। हवा-हवाई बयानों और गुप्त बैठकों के बजाय अब वक्त आ गया है कि विभागीय अभिलेखों, पारदर्शी शासनादेशों और निष्पक्ष कार्यमुक्ति आदेशों के जरिए इस पूरे विवाद पर विराम लगाया जाए।



