जंगल जासूस 👉
हजूर 👉उत्तराखण्ड वन निगम में जांच के नाम पर बड़ा खेल👉 फर्जी श्रमिकों से लेकर जड़ खुदान घोटाले तक, आरटीआई खुलासों ने खोली अफसरों की पोल?
हजूर 👉 उत्तराखण्ड वन निगम के शांत और घने जंगलों के बीच इन दिनों एक ऐसा प्रशासनिक भूचाल आया हुआ है, जिसने महकमे के बड़े-बड़े हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। मामला कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि सरकारी खजाने को चूना लगाने, कागजों पर फर्जी मजदूर खड़े करके बजट डकारने और जंगलों में जड़ खुदान के नाम पर करोड़ों रुपये का कथित वारा-न्यारा करने से जुड़ा है। जब इस पूरे खेल के पुख्ता सबूत लेकर शिकायतकर्ता ने प्रमुख वन सचिव से लेकर निगम के आलाधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, तो उम्मीद यह थी कि दूध का दूध और पानी का पानी होगा और कसूरवारों पर कड़ी गाज गिरेगी। लेकिन साहब, इसके उलट जो प्रशासनिक बाजीगरी देखने को मिली, उसने पूरी जांच प्रणाली की साख और निष्पक्षता पर ही एक बड़ा सवालिया निशान चस्पा कर दिया है।
हजूर 👉 जांच प्रक्रिया और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए नए तथ्यों ने इस पूरे मामले को और भी ज्यादा दिलचस्प और संदेहास्पद बना दिया है। जब शिकायतकर्ता ने क्षेत्रीय प्रबंधक कुमाऊं, हल्द्वानी के कार्यालय से आरटीआई के तहत सूचना मांगी, तो जो दस्तावेज और जानकारियां निकलकर आईं, उन्होंने प्रशासनिक कार्यप्रणाली की परतें खोलकर रख दीं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक खुद क्षेत्रीय प्रबंधक कुमाऊं मयंक शंकर झा जांच अधिकारियों को इस प्रकरण में बार-बार अनुस्मारक पत्र यानी रिमाइंडर जारी कर चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब क्षेत्रीय प्रबंधक स्वयं जांच में हो रही देरी को लेकर रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेज रहे थे, तो जांच को किस मोड़ पर और किस मंशा के साथ दबाने या अटकाने का प्रयास किया जा रहा था।
हजूर 👉 मामले में सबसे तड़कता-भड़कता और गंभीर मोड़ शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए एक नए आरोप से सामने आया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि शिकायत की पुष्टि और उसकी सत्यता साबित करने के लिए क्षेत्रीय प्रबंधक मयंक शंकर झा ने शिकायतकर्ता से इस बात का बाकायदा हलफनामा यानी एफिडेविट जमा करवाया कि उसकी शिकायत पूरी तरह सही और सत्य है। लेकिन सबसे बड़ा पेच यह है कि एफिडेविट जैसी विधिक औपचारिकता पूरी कराने के बाद भी जांच के दौरान शिकायतकर्ता के आधिकारिक बयान दर्ज ही नहीं किए गए। किसी भी पारदर्शी जांच का बुनियादी नियम होता है कि आरोप लगाने वाले का बयान दर्ज कर साक्ष्यों का आमने-सामने परीक्षण किया जाए। जब एफिडेविट लेकर शिकायत की गंभीरता को स्वीकार कर लिया गया, तो फिर शिकायतकर्ता को बयान दर्ज कराने का मौका न देकर जांच को आगे बढ़ा देना अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक रहस्य बन गया है।
हजूर 👉 जांच अधिकारी की तैनाती को लेकर जो पेच फंसा है, वह इस पूरी व्यवस्था का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू है। जिस मामले में एक खास प्रभाग के अधिकारियों की साठगांठ और कार्यप्रणाली पर सीधे उंगली उठी हो, उसी मामले की जांच का जिम्मा उसी स्तर के और उसी क्षेत्र में तैनात अधिकारियों को सौंप दिया गया। कुमाऊं मंडल के क्षेत्रीय प्रबंधक मयंक शंकर झा की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिन्होंने मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के बजाय हल्द्वानी के उन्हीं समकक्ष अफसरों के पाले में जांच डाल दी, जिनकी स्वतंत्रता पर शिकायतकर्ता पहले से ही आशंका जता रहा था। हद तो तब हो गई जब सेवानिवृत्त हो चुके जिम्मेदार अधिकारी के प्रभाग में नए आए अफसर को ही मुंशी और जज दोनों बना दिया गया। जब कटघरे में खड़े लोग या उनके अपने साथी ही जांच की कमान संभालेंगे, तो सच बाहर आएगा या फाइलों के नीचे दफना दिया जाएगा, यह समझने के लिए किसी बड़े गणित की जरूरत नहीं है।
हजूर 👉 सरकारी महकमों में फर्जी हाजिरी और मस्टर रोल का खेल नया नहीं है, लेकिन वन निगम में जिस सफाई से फर्जी मस्टर रोल तैयार करके लाखों-करोड़ों का भुगतान कागजी श्रमिकों के नाम पर दिखाया गया, वह किसी सनसनीखेज घोटाले से कम नहीं लगता। नियमानुसार हर एक मस्टर रोल, श्रमिकों की उपस्थिति, बैंक खातों, बैंक ट्रांजैक्शन और वर्क ऑर्डर की एक-एक पाई का मिलान होना चाहिए था। इसी तरह जंगल की जड़ें वास्तव में खुदीं या सिर्फ अफसरों की कलम की स्याही से कागजों पर उखाड़ दी गईं, इसका जमीनी और वैज्ञानिक सत्यापन होना चाहिए था। लेकिन जांच के नाम पर वातानुकूलित कमरों की ठंडी हवा में बैठकर फाइलें पलट दी गईं और जमीनी हकीकत को जस का तस छोड़ दिया गया।
हजूर 👉 इस पूरी कहानी का सबसे तड़कता-भड़कता मोड़ तब आया जब मुख्यमंत्री पोर्टल पर अचानक एक अपडेट चमका कि जांच समाप्त हो चुकी है। अब पूरा प्रदेश और आम जनता यह जानने को बेताब है कि जब जांच समाप्त हो गई, तो उस जांच की विस्तृत रिपोर्ट कहां है। क्या करोड़ों का नुकसान करने वाले रातों-रात बेदाग साबित हो गए, या फिर शिकायतकर्ता के दिए गए सबूत झूठे निकल गए। यदि आरोप सही थे तो अब तक किस अधिकारी पर कार्रवाई की गाज गिरी, और यदि आरोप गलत थे तो उन्हें खारिज करने का ठोस और साक्ष्य-आधारित आधार क्या था। पोर्टल पर सिर्फ एक शब्द समाप्त लिखकर फाइल बंद कर देना जनता के टैक्स के पैसे के साथ एक भद्दा मजाक जैसा लगता है।
हजूर 👉 प्रशासनिक लीपापोती की इंतिहा तो तब देखने को मिलती है जब शिकायतकर्ता पर ही यह लिखकर देने का दबाव बनाया जाता है कि वह जांच प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट है। किसी भी सरकारी जांच का सच या उसकी गुणवत्ता शिकायतकर्ता से जबरन छीने गए संतुष्टि पत्र से तय नहीं होती, बल्कि वह जांच में जुटाए गए ठोस सबूतों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और कारणयुक्त निष्कर्षों से साबित होती है। शिकायतकर्ता से एफिडेविट लेने के बावजूद उसके बयान दर्ज न करना, उसे जांच रिपोर्ट की कॉपी न देना, उसकी लिखित आपत्तियों को दरकिनार करना और कागजी खानापूर्ति करके मामले को दफना देना साफ बताता है कि विभाग सच को बाहर लाने से कितना डरा हुआ है।
हजूर 👉 उत्तराखण्ड का वन निगम प्रदेश की अमूल्य प्राकृतिक संपत्ति और जनता की गाढ़ी कमाई से चलता है। सरकारी जांच का मकसद केवल फाइलों का पेट भरना या अपनों को बचाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाकर दोषियों को सजा दिलाना और सरकारी धन की रक्षा करना होता है। अगर वन निगम के दामन पर कोई दाग नहीं है, तो उसे अपनी जांच रिपोर्ट, आरटीआई में आई जानकारियां, मस्टर रोल, बैंक रिकॉर्ड और तकनीकी मूल्यांकन के सारे पन्ने सार्वजनिक कर देने चाहिए। क्योंकि साहब, कागजी पर्दों और हलफनामों की आड़ में सच को ज्यादा देर तक नहीं छिपाया जा सकता और जनता को गोलमोल जवाबों से ज्यादा एक निष्पक्ष और पारदर्शी न्याय की दरकार है।



