हजूर 👉उत्तराखंड के डिजिटल मॉडल से थमा वनाग्नि का तांडव👉दूसरे राज्यों में भी बढ़ रही ‘फॉरेस्ट फायर ऐप’ की जबरदस्त मांग?

जंगल फॉर पोलखोल 👉

हजूर 👉उत्तराखंड के डिजिटल मॉडल से थमा वनाग्नि का तांडव👉दूसरे राज्यों में भी बढ़ रही ‘फॉरेस्ट फायर ऐप’ की जबरदस्त मांग?

हजूर 👉 देवभूमि उत्तराखंड के जंगलों को हर साल गर्मी के मौसम में भीषण वनाग्नि की आपदा से भारी नुकसान उठाना पड़ता था, लेकिन तकनीक के इस्तेमाल ने इस विकट समस्या से निपटने की दिशा में एक नई उम्मीद जगाई है। राज्य के एक दूरदर्शी भारतीय वन सेवा अधिकारी वैभव कुमार सिंह की पहल पर वर्ष 2021 से विकसित की जा रही ‘फॉरेस्ट फायर एप्लीकेशन’ अब धरातल पर अपने सकारात्मक परिणाम दिखा रही है। इस डिजिटल प्रणाली को कई चरणों में अपडेट करने के बाद उत्तराखंड वन विभाग के दैनिक तंत्र में शामिल किया गया है, जिसने आग की निगरानी से लेकर मैदानी प्रतिक्रिया की पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह से आधुनिक बना दिया है।
हजूर 👉 इस एप्लीकेशन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसने सूचना मिलने से लेकर मौके पर टीम के पहुंचने के बीच लगने वाले समय को काफी कम कर दिया है। पहाड़ी भूगोल, दूरदराज के घने जंगलों और कई स्थानों पर सड़क संपर्क न होने की वजह से राहत टीमों को समय पर भेजना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐप के जरिए आग की सटीक जगह मिलते ही सबसे नजदीक मौजूद कर्मचारी, टीम और वाहन का तुरंत पता लगाकर उन्हें रवाना कर दिया जाता है। विभाग का दावा है कि इस डिजिटल सिस्टम के प्रयोग से प्रतिक्रिया समय में लगभग 9 घंटे तक की अभूतपूर्व कमी दर्ज की गई है, जिससे शुरुआती दौर में ही आग पर काबू पाना संभव हो पा रहा है।
हजूर 👉 इस डिजिटल मॉडल की उपयोगिता सिर्फ तात्कालिक प्रतिक्रिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका मजबूत आंकड़े का आधार भविष्य की रणनीतियों को गढ़ने में भी अहम भूमिका निभा रहा है। ऐप में वनाग्नि की पिछली घटनाओं, उनके समय, स्थान और संभावित कारणों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है। इस ऐतिहासिक आंकड़े का विश्लेषण करके वन विभाग अधिक संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित करता है। इससे उन इलाकों में पहले से ही फायर लाइनों की सफाई, अतिरिक्त निगरानी, कर्मचारियों की तैनाती और संसाधनों का अग्रिम आवंटन संभव हो पाता है, जिससे जंगलों को बड़े विनाश से बचाया जा सकता है।
हजूर 👉 हालांकि इस तकनीक के जहां अनेक फायदे हैं, वहीं इसके कार्यान्वयन को लेकर कुछ व्यावहारिक धरातलीय चुनौतियां भी बनी हुई हैं। उत्तराखंड के बेहद दुर्गम और पर्वतीय क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता या कमजोर संपर्क इस डिजिटल प्रणाली के सुचारू संचालन में एक बड़ा रोड़ा साबित होती है। इसके अलावा, आलोचकों का यह भी मानना है कि ऐप केवल सूचना और निगरानी की प्रक्रिया को गति दे सकता है, लेकिन मैदान पर आग बुझाने के लिए अंततः पर्याप्त मैदानी कर्मचारी, पारंपरिक उपकरणों, पानी के साधनों और स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता ही निर्णायक सिद्ध होती है।
हजूर 👉 इन चुनौतियों के बावजूद, आधुनिक तकनीक और जमीनी व्यवस्था के इस सफल तालमेल ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए इस मॉडल को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई है, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी इस नवाचार की सराहना करते हुए इसे देश के अन्य राज्यों के लिए एक संभावित मॉडल के रूप में पेश करने की वकालत की है। यदि इस एप्लीकेशन को बेहतर नेटवर्क अवसंरचना, पर्याप्त जमीनी संसाधनों और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान से पूरी तरह जोड़ दिया जाए, तो यह देश भर में वनाग्नि प्रबंधन की एक ऐतिहासिक दिशा तय कर सकता है।
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