जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 तराई में पकड़ा जा रहा लीसा, तो पहाड़ में कौन लगा रहा पेड़ों को घाव? 👉जागेश्वर के कटघरे में हिलता लीसा का ‘सिंडिकेट’ और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो!
हजूर 👉 उत्तराखंड के जंगलों में लीसा के नाम पर चल रहे इस अवैध खेल की गूंज अब तराई के मैदानों से टकराकर सीधे वन मुख्यालय के बंद कमरों और अफसरों के दफ्तरों तक धमक दे रही है। हाल ही में सोशल मीडिया पर पेड़ों से अवैध रूप से लीसा निकालने के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिन्होंने विभागीय दावों की पोल खोलकर रख दी है। बाजपुर की गलियों में रात के अंधेरे में पकड़ी गई गाड़ियाँ हों या रामनगर के नाकों पर ज़ब्त सैकड़ों टिन, वन महकमा ज़ब्ती का आंकड़ा दर्ज करके भले ही खुद को ‘चौकस’ साबित कर ले, लेकिन सच यही है कि यह अवैध माल सड़कों पर आसमान से नहीं टपक रहा। जब प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) की कमान कपिल लाल के हाथों में आई थी, तो उम्मीद थी कि जंगल से निकलने वाली लीसा की एक-एक बूंद का हिसाब होगा। लेकिन दनादन चेकिंग के दावों के बीच अगर अवैध लीसा की खेपें बेखौफ दौड़ रही हैं, तो सवाल सीधे निगरानी व्यवस्था पर उठता है👉क्या यह चेकिंग माफिया को रोकने के लिए थी या सिर्फ दफ्तरी कोरम?
हजूर 👉 इस पूरे सिंडिकेट का सबसे बड़ा और सनसनीखेज मामला अल्मोड़ा जिले की जागेश्वर रेंज के धौलादेवी अनुभाग (चिर्माख व कछियौला) से सामने आया है। ग्राम कछियायौला के साहसी नागरिक शिकायतकर्ता किशन सिंह पुत्र श्री लाल सिंह ने ऑन-रिकॉर्ड शिकायत दर्ज कराकर इस संस्थागत खेल का पर्दाफाश कर दिया है। आरोप बेहद गंभीर है👉रसूखदार ठेकेदार ने कागज़ों पर मंज़ूरी तो अपनी निजी नाप ज़मीन के गिने-चुने पेड़ों की ली, लेकिन ब्लेड और कटारियाँ चला दीं पास के सरकारी बेनाप जंगल के 400 से 500 बेकसूर चीड़ के पेड़ों पर! परमिशन निजी खेत की और दोहन सरकारी वन संपदा का👉यह वह खेल है जिसकी बदौलत माफिया रातों-रात करोड़ों बटोर रहा है। अगर किशन सिंह के इस खुलासे और वायरल वीडियो में सच्चाई है, तो यह ज़मीनी अमले से लेकर अदृश्य आकाओं तक फैली साठगांठ को बयां करता है।
हजूर 👉 मामला सिर्फ सरकारी ज़मीन और संपत्ति की चोरी का नहीं, बल्कि नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए छोटे और कम उम्र पेड़ों के सीधे नुकसान का है। शिकायतकर्ता किशन सिंह द्वारा पेश साक्ष्यों के अनुसार 9 से 12 इंच जैसी मामूली गोलाई वाले छोटे-छोटे चीड़ के तनों पर भी निर्दयता से गमले ठोक दिए गए हैं। वन विभाग की नियमावली स्पष्ट कहती है कि कम उम्र और पतले पेड़ों से लीसा दोहन पूरी तरह प्रतिबंधित है, क्योंकि इससे पेड़ सूख जाता है। लेकिन जागेश्वर के जंगलों में उन नन्हें तनों को भी ज़ख्मी कर दिया गया जिन्हें कल का हरा-भरा जंगल बनना था। अब सवाल सीधा अफ़सरशाही से है👉क्या अधिकारी जागेश्वर के उन प्रभावित पेड़ों के पास जाकर उनकी गिनती करने का दम दिखाएंगे, या फिर फाइलों की स्याही के नीचे इस सच को दफन कर दिया जाएगा?
हजूर 👉 इस संवेदनशील मामले पर जब जागेश्वर रेंज के रेंजर राजेश जोशी से सवाल दागे गए, तो महकमे का वही टालमटोल वाला रवैया सामने आया। रेंजर साहब का कहना है कि प्रकरण की जांच प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) अल्मोड़ा के आदेशों पर चल रही है। शुरुआत में DFO साहब ने जांच का जिम्मा रेंजर को सौंपा था, लेकिन रेंजर साहब ने यह जांच अपने डिप्टी रेंजर की गोद में डालकर कछुआ चाल का खेल शुरू कर दिया। ज़रा सोचिए, जब ग्रामीण किशन सिंह ने मोर्चा खोला हो, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हों, 500 पेड़ों का अवैध दोहन हो चुका हो और तराई में अवैध टिन पकड़े जा रहे हों, तब ज़िम्मेदार अधिकारी खुद मौके पर जाने के बजाय फाइल मातहत की मेज़ पर सरकाकर तमाशा देख रहे हैं। क्या यह वाकई निष्पक्ष जांच है या मामले को ठंडे बस्ते में डालने की विभागीय चालबाज़ी?
हजूर 👉 तराई के बाजपुर व रामनगर के नाकों पर पकड़े जा रहे अवैध टिनों, वायरल वीडियो और जागेश्वर के जंगलों से उठी किशन सिंह की आवाज़ को जोड़ें, तो लीसा सिंडिकेट का एक बड़ा नक्शा उभरता है। तराई की ब्लैक मार्केट में खप रहा बेहिसाब अवैध लीसा आखिर किस पहाड़ी ढलान से बहकर नीचे लाया जा रहा है? क्या जागेश्वर जैसे शांत जंगलों का अवैध दोहन करके ही तस्करों की जेबें भरी जा रही हैं? और अगर हाँ, तो फिर वह कौन सा गुप्त ‘सुरक्षित गलियारा’ (सेफ कॉरिडोर ) है जो चेकिंग बैरियरों की आंखों में धूल झोंककर रसद पहुंचा रहा है? जंगल का सच फाइलों में बंद नहीं रहता, क्योंकि पेड़ अपनी छाल पर लगे घावों से गवाही देते हैं। अब देखना यह है कि शीर्ष वन महकमा दो-चार गाड़ियों का चालान काटकर मामले को दबाता है, या फिर किशन सिंह की शिकायत का संज्ञान लेकर पूरे सिंडिकेट पर शिकंजा कसता है!



