जंगल जासूस 👉
हजूर 👉मंजू देवी की मौत ने पूछ दिया👉जंगल बचाने की होड़ में जंगल के इंसान का क्या?
हजूर 👉 देहरादून के एफआरआई में वन्यजीव सप्ताह का मंच चमक रहा था, तालियां गूंज रही थीं, 18 साहसी लोगों को सम्मान मिल रहा था और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मानव👉वन्यजीव संघर्ष कम करने के सरकारी संकल्प सुना रहे थे। मुआवजा ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख करने की घोषणा हुई, ईको-टूरिज्म, GEP और “सीएम यंग ईको-प्रिन्योर” जैसी बड़ी तस्वीरें सामने रखी गईं। मगर इसी चमकदार तस्वीर के पीछे पहाड़ का एक घर अंधेरे में डूब चुका था। नैनीडांडा के ढंगल गांव की मंजू देवी बकरियां चराने निकली थीं👉न कोई सफारी, न कोई रोमांच, न कैमरा👉बस रोज की जरूरत👉लेकिन झाड़ियों में छिपे भालू ने हमला किया और गंभीर रूप से घायल मंजू देवी रामनगर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते जिंदगी और मौत के बीच जूझने लगीं। हायर सेंटर की तैयारी होती रही और जिंदगी ने रास्ते में ही हाथ छोड़ दिया।
हजूर 👉 यही है पहाड़ का असली वन्यजीव सप्ताह! मैदान में बाघ दिख जाए तो पर्यटक रोमांचित होता है, कैमरा निकलता है, फोटो बनती है और पर्यटन की कहानी आगे बढ़ती है👉लेकिन पहाड़ में भालू दिख जाए तो गांव का दरवाजा बंद होता है, बच्चे सहमते हैं और जंगल जाने वाली महिलाओं के कदम रुक जाते हैं। एक ही वन्यजीव👉किसी के लिए आकर्षण, किसी के लिए आफत! मंजू देवी जंगल में वन्यजीव देखने नहीं गई थीं, वह अपने पशुओं के लिए निकली थीं। यही एक तथ्य वन्यजीव पर्यटन और पहाड़ के ग्रामीण जीवन के बीच की पूरी दूरी नाप देता है।
हजूर 👉 ऊपर से योजनाओं की बरसात👉कॉर्बेट से राजाजी तक संरक्षण, स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स, स्नो लेपर्ड पर्यटन, ईको-टूरिज्म और युवाओं के लिए रोजगार की बातें। योजनाएं अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन जंगल की सीमा पर रहने वाला आदमी पूछ रहा है👉मेरी सुरक्षा की योजना कहां है? जिस महिला के लिए जंगल रोजी-रोटी का हिस्सा है, उसके लिए सुरक्षित रास्ता कौन बनाएगा? गांव के आसपास वन्यजीव की मौजूदगी की सूचना पहले कौन देगा? बच्चों के स्कूल जाने के रास्ते पर निगरानी कौन करेगा? मंजू देवी की मौत इन सवालों को कागज से उठाकर सीधे जमीन पर पटक गई है।
हजूर 👉 मौत के बाद ग्रामीणों का गुस्सा भी फूट पड़ा। वन चौकी पर प्रदर्शन, क्षेत्र में गश्त बढ़ाने की मांग और परिवार के लिए आर्थिक सहायता व नौकरी की मांग👉यानी गांव अब सिर्फ सांत्वना नहीं, सुरक्षा का हिसाब मांग रहा है। गढ़वाल वन प्रभाग के डीएफओ महातिम यादव मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया👉वन विभाग की ओर से पिंजरा लगाने और गश्त की कार्रवाई भी सामने आई। मगर ग्रामीणों का सवाल सीधा है👉भालू के हमले के बाद पिंजरा क्यों, उससे पहले पुख्ता निगरानी क्यों नहीं? बेशक हर वन्यजीव की गतिविधि को पहले से रोकना आसान नहीं, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों में खतरे की पहचान और समय पर चेतावनी व्यवस्था कितनी मजबूत थी👉इसका जवाब अब विभाग को देना होगा।
हजूर 👉 और मुआवजे की बात भी सुन लीजिए। सरकार ने वन्यजीव हमले में मौत पर अनुग्रह राशि ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख की है। रकम परिवार के लिए मदद जरूर हो सकती है, लेकिन मंजू देवी की जगह कौन लेगा? घर की जिम्मेदारी, पशु, परिवार और रोजमर्रा की जिंदगी👉इन सबका हिसाब सरकारी चेक में नहीं लिखा होता। इसलिए ग्रामीणों की नौकरी और स्थायी सहायता की मांग को केवल रकम से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वन्यजीव संघर्ष का समाधान घटना के बाद मुआवजा देना भर नहीं, बल्कि घटना से पहले खतरा घटाना भी है।
हजूर 👉 वन्यजीव बचाइए👉जरूर बचाइए। जंगल बचाइए👉बिल्कुल बचाइए। लेकिन जंगल के किनारे रहने वाले इंसान को भी इस कहानी का हीरो बनाइए, फुटनोट नहीं। देहरादून में वन्यजीव सप्ताह की तालियां तब असली जीत बनेंगी, जब नैनीडांडा की पगडंडी पर घास लेने निकली महिला को भालू से बचने के लिए किस्मत के भरोसे न रहना पड़े। मंजू देवी की मौत को सिर्फ एक घटना मानकर फाइल बंद कर दी गई तो सवाल फिर लौटेगा👉जंगल बचा, वन्यजीव बचा, पर्यटन बचा👉 लेकिन मंजू देवी क्यों नहीं बचीं?



