जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 “वन्यजीव बचाव की आड़ में नियमों का खेल? वाइल्डलाइफ एसओएस के 12 केंद्र सीजेडए की जांच के घेरे में?
हजूर 👉दिल्ली से निकली केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण यानी सीजेडए की एक कार्रवाई ने वन्यजीव संरक्षण की चमकदार तस्वीर के पीछे छिपे कागजी हिसाब-किताब पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वाइल्डलाइफ एसओएस से जुड़े 12 केंद्रों को लेकर सीजेडए ने छह राज्यों और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के मुख्य वन्यजीव वार्डनों को निरीक्षण के निर्देश दिए हैं। 12 सितंबर 2026 को जारी पत्रों में सात दिन के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि शिकायतों में केवल सामान्य अनियमितताओं की बात नहीं, बल्कि केंद्रों की वैधानिक मान्यता, वन्यजीवों को रखने की अनुमति और रिकॉर्ड व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। अब फैसला दफ्तर की फाइलों से नहीं, मौके पर होने वाले निरीक्षण से निकलेगा।
हजूर 👉सबसे बड़ा सवाल सीजेडए की अनिवार्य मान्यता को लेकर है। शिकायतों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 38-एच के अनुपालन पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ ऐसी सुविधाएं संचालित की गईं जो कानून की नजर में चिड़ियाघर की श्रेणी में आ सकती हैं, लेकिन उनके पास आवश्यक वैधानिक मंजूरी को लेकर स्थिति साफ नहीं है। आगरा के भालू बचाव केंद्र में नवीनीकरण से संबंधित सवाल और मथुरा के हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र की मान्यता को लेकर उठी आपत्तियां अब जांच का हिस्सा हैं। यानी जिस व्यवस्था का उद्देश्य रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों को सुरक्षित ठिकाना देना है, उसी व्यवस्था के कागज अब सरकारी जांच की मेज पर पहुंच गए हैं।
हजूर 👉मामला सिर्फ उत्तर प्रदेश की दो सुविधाओं तक सीमित नहीं है। सीजेडए के निर्देश हरियाणा के गुरुग्राम, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, महाराष्ट्र, कर्नाटक के बेंगलुरु और जम्मू-कश्मीर के पहलगाम तथा दाचीगाम तक पहुंचते हैं। बेंगलुरु के बैनरघट्टा और भोपाल के वन विहार से जुड़े ऑफ-डिस्प्ले केंद्रों में अनुसूची-1 और अनुसूची-2 के वन्यजीवों को रखने अथवा स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक अनुमति से जुड़े सवाल भी जांच के घेरे में हैं। अब हर केंद्र में यह मिलान होना है कि कागज पर दर्ज अनुमति और जमीन पर मौजूद व्यवस्था एक-दूसरे से कितनी मेल खाती है।
हजूर 👉वन्यजीव संरक्षण में असली खेल संख्या का नहीं, पहचान और हिसाब का होता है। कौन सा जानवर कहां से आया, किस तारीख को आया, किस अनुमति के तहत रखा गया, उसकी माइक्रोचिपिंग हुई या नहीं, टैग नंबर क्या है, उसका इलाज कहां हुआ और यदि उसकी मृत्यु हुई तो रिकॉर्ड में क्या दर्ज है👉इन सवालों का जवाब हर वैधानिक केंद्र के पास होना चाहिए। सीजेडए के सामने माइक्रोचिपिंग, टैगिंग और वार्षिक इन्वेंट्री से जुड़े अनुपालन के सवाल भी आए हैं। यदि सरकारी निरीक्षण में रिकॉर्ड और मौके पर मौजूद वन्यजीवों के बीच अंतर मिलता है तो मामला केवल कागजी कमी का नहीं रहेगा, बल्कि निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होंगे।
हजुफ 👉वाइल्डलाइफ एसओएस लंबे समय से वन्यजीव बचाव और पुनर्वास के काम से जुड़ी संस्था है और इसी कारण उसके केंद्रों पर होने वाली यह जांच खास महत्व रखती है। लेकिन किसी संस्था की प्रतिष्ठा जांच का विकल्प नहीं हो सकती और दूसरी तरफ शिकायत को अंतिम सच मान लेना भी उचित नहीं होगा। अभी सीजेडए ने अंतिम दोष तय नहीं किया है; उसने निरीक्षण और रिपोर्ट मांगी है। इसलिए असली कहानी उन रिपोर्टों में छिपी होगी, जिनमें केंद्र की मान्यता, नवीनीकरण, वन्यजीवों की संख्या, माइक्रोचिपिंग, टैगिंग, वार्षिक रिकॉर्ड और जानवरों के स्थानांतरण से जुड़े दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
हजूर 👉अब सात दिन की यह समय-सीमा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। निरीक्षण दल जब केंद्रों में पहुंचेंगे तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि वहां कितने जानवर हैं, बल्कि यह भी होगा कि हर जानवर की सरकारी फाइल कहां है और उस फाइल का जमीन पर मौजूद जानवर से कितना मेल बैठता है। सीजेडए की रिपोर्ट के बाद ही साफ होगा कि शिकायतों में लगाए गए आरोप कितने सही निकलते हैं और कहां केवल अनुपालन की कमी थी। फिलहाल 12 केंद्र जांच के घेरे में हैं, कई राज्यों से रिपोर्ट मांगी गई है और वन्यजीव प्रशासन की नजर अब दस्तावेजों से लेकर परिसर तक पहुंच चुकी है। जंगल के जानवरों का हिसाब अब कागज से निकलकर सरकारी निरीक्षण की कसौटी पर है।



