जंगल जासूस 👉
हजूर 👉वन विभाग में फिर खड़खड़ाईं कुर्सियां! 👉प्रभागों का नक्शा बदलेगा, सिविल सोयम मर्ज होगा और DFO की गिनती भी घटेगी?
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विभाग में एक बार फिर बड़े प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जंगलों में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं, रेंजें अपनी जगह मौजूद हैं और वनकर्मी रोज की तरह मैदान में हैं, लेकिन विभागीय दफ्तरों में अब चर्चा इस बात की है कि आने वाले दिनों में प्रशासनिक नक्शा कितना बदलेगा। प्रमुख वन संरक्षक हॉफ कपिल लाल ने रेंजर, डिप्टी रेंजर, वन दरोगा, वन रक्षक समेत विभिन्न कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में कर्मचारियों की समस्याओं और मांगों के साथ विभाग की मौजूदा संरचना को नए सिरे से व्यवस्थित करने की संभावनाओं पर भी बातचीत हुई। जिलों के आधार पर प्रभागों की नई व्यवस्था, सिविल सोयम के विलय, कई रेंजों की सीमाओं में बदलाव और DFO स्तर पर पदों को सीमित करने जैसे मुद्दे चर्चा में आए हैं।
हजूर 👉 इस पूरी कवायद का सबसे अहम पहलू यह है कि अभी इसे कोई अंतिम फैसला नहीं कहा जा सकता। न कोई नया प्रभाग अस्तित्व में आया है और न किसी मौजूदा प्रभाग के विलय का शासनादेश जारी हुआ है। लेकिन विभाग के शीर्ष स्तर पर कर्मचारी संगठनों के सामने पुनर्गठन का मुद्दा रखे जाने से यह जरूर संकेत मिलता है कि पुराने प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा का विचार फिर सक्रिय हुआ है। हॉफ कपिल लाल ने सीधे कोई आदेश सुनाने के बजाय पहले कर्मचारी संगठनों को बातचीत में शामिल किया। विभिन्न संगठनों ने भी अपनी लंबित मांगों और समस्याओं से जुड़े मांगपत्र सामने रखे। अब देखना यह होगा कि बैठक की चर्चा आगे चलकर समिति, प्रस्ताव और शासन के निर्णय तक पहुंचती है या नहीं।
हजूर 👉 पुनर्गठन के पीछे मैनपावर का गणित भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में यह बात सामने आई कि वन विभाग की उपलब्ध मानव शक्ति का एक हिस्सा वन पंचायत और सिविल सोयम से जुड़े कार्यों में लगा हुआ है। ऐसे में विभाग के सामने सवाल यह है कि उपलब्ध कर्मचारियों और अधिकारियों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल कैसे किया जाए। यदि प्रभागों और रेंजों की संरचना नए सिरे से बनाई जाती है तो उसका असर केवल कार्यालयों की सीमाओं पर नहीं पड़ेगा, बल्कि कर्मचारियों की तैनाती, जिम्मेदारियों और जंगल की निगरानी की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यानी फाइल पर खींची जाने वाली एक लकीर का असर जंगल की जमीन तक पहुंच सकता है।
हजूर 👉 वन विभाग में प्रभागों को कम करने और आपस में मिलाने की चर्चा आज की नहीं है। पिछले कई वर्षों से विभागीय पुनर्गठन को लेकर अलग-अलग स्तर पर विचार सामने आते रहे हैं। करीब एक वर्ष पहले भी लगभग दस वन प्रभाग कम किए जाने की चर्चा ने विभागीय गलियारों में हलचल पैदा की थी। हालांकि उन दस प्रभागों के नाम और उनके विलय की अंतिम रूपरेखा को लेकर कोई स्पष्ट अंतिम सरकारी आदेश सामने नहीं आया। इसलिए उस चर्चा को वर्तमान निर्णय मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन अब हॉफ स्तर पर पुनर्गठन की बात कर्मचारी संगठनों के सामने आने के बाद पुराना मुद्दा फिर चर्चा में जरूर लौट आया है।
हजूर 👉 तराई क्षेत्र में इस संभावित बदलाव को लेकर दिलचस्पी स्वाभाविक है। तराई पूर्वी, तराई केंद्रीय और तराई पश्चिमी के साथ हल्द्वानी और रामनगर जैसे महत्वपूर्ण वन प्रभाग वर्तमान में अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों के रूप में काम कर रहे हैं। यदि भविष्य में प्रभागों और रेंजों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण होता है तो इन क्षेत्रों में अधिकारियों का क्षेत्राधिकार, कर्मचारियों की तैनाती और वन प्रबंधन की जिम्मेदारियां बदल सकती हैं। मगर अभी किसी भी प्रभाग के विलय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल सवाल बड़ा है, लेकिन अंतिम तस्वीर सरकारी प्रस्ताव और आदेश आने के बाद ही साफ होगी।
हजूर 👉 इसी के साथ सिविल सोयम से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी विभागीय हलकों में चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। संभावित पुनर्गठन की स्थिति में अधिकारियों की मौजूदा जिम्मेदारियों और तैनातियों की समीक्षा होना स्वाभाविक है। कुछ अधिकारियों को उनके मूल पदों पर वापस भेजे जाने जैसी चर्चाएं भी सुनाई दे रही हैं, लेकिन इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक आदेश सामने नहीं आया है। लिहाजा इसे फिलहाल विभागीय चर्चा से आगे बढ़ाकर तथ्य मानना उचित नहीं होगा। असली तस्वीर तभी सामने आएगी जब पुनर्गठन का औपचारिक प्रस्ताव तैयार होगा और शासन उस पर निर्णय करेगा।
हजूर 👉 अब असली नजर उस फाइल पर है जो इस बैठक के बाद आगे बढ़ेगी। क्या वन प्रभागों की नई संरचना तैयार होगी, क्या सिविल सोयम की व्यवस्था बदलेगी, क्या रेंजों की सीमाएं फिर खींची जाएंगी और क्या DFO स्तर पर पदों की संख्या वास्तव में घटाई जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से चर्चा में घूम रहा पुनर्गठन इस बार आदेश की चौखट तक पहुंचता है या फिर सरकारी फाइलों की पुरानी परंपरा के मुताबिक कुछ दूर चलकर फिर किसी अलमारी में विश्राम करने लगता है। जंगल जासूस की नजर अब उसी फाइल पर है, क्योंकि जंगल के पेड़ अपनी जगह से नहीं हिलेंगे, लेकिन अगर सरकारी नक्शे पर रबर चली तो कई साहबों को अपने नए प्रशासनिक पते की तलाश जरूर करनी पड़ सकती है।



